सोमवार, 29 दिसंबर 2014

पशुओं के साथ ब्यभिचार

समय ही सबसे महत्वपूर्ण होता है यह समय ऐसा है कि मेरे मन में इतने विचार चलते रहते है कि लिखने को सोचना पडता किस विषय में पहले लिखूं।

सभी का एक राज होता है और एक रहस्य छिपा रहता है ऐसा ही एक रहस्य मेरा भी है जो मैने आपको नहीं बताया था।

जब उस दिन एर्जेंटीना के ब्यनास शहर गया था आप सभी को शेर की सवारी के बारे में बताया था कि किस प्रकार से खूंखार बब्बर शेरों कि सवारी वहां की जाती है और सच है सतप्रतिशत सच है।

खूंखार बब्बर शेरों को ट्रेनिंग दी जाती है यह बात जू के ट्रेनरों के द्वारा स्वीकर की गयी है लेकिन एक एनीमल एक्टिवेस्टि ने वहां के न्यायालय में मुकदमा दायर किया है कि बब्बर शेरों को एक विशेष प्रकार का नशीला पदार्थ  दिया जाता है।

उस नशीले पदार्थ की ताकत से बब्बर शेर आलसी पृवत्ति के हो जाते है उनके अंदर की खूंखारता एक निश्चित समय के लिये खत्म हो जाती है।

हम इंसान कितने स्वार्थी हो चुके है कि अपनी कमाई के लिये हम बब्बर शेरों के साथ दुराचार कर रहे है उनके स्वभाव के साथ ब्यभिचार कर रहे है।

नशा सिर्फ नशीले पदार्थ का नहीं होता एक नशा चाय का जो अंग्रेज हमें दे गये और मैं भी चाय के नशे का शिकार हूं परंतु मैं किसी को शिकार बनाता नहीं हूं।

एक नशा विचारों का होता है हर एक इंसान किसी ना किसी विचार के नशे में डूबा होता है और विचारों का ये नशा धार्मिक उन्माद भी पैदा करता है और कुछ लोग लाशों की सवारी करते हैं।

सिर्फ धार्मिक उन्माद ही नहीं कोई कोई इंसान ऐसा भी होता है जो अपने निजी विचारों का ही पूर्णतया प्रेम और भावनाओं में अनवरत डुबाता जायेगा और इंसान उन भावनाओं का आदी होने लगता है।

ठीक उसी तरह जब एक लडके को एक लडकी से सच्चा वाला प्यार हो जाये तो वह वही करता है जो लडकी चाहती है हांजी हांजी के सिवाय कुछ नजर नहीं आता क्यूंकि उसकी खुशियां उसकी सांसे हो जाती है उसकी धडकने उसकी मुस्कान से चलती है वह अगर रूठ जाये तो वह आंसूओं की धारा बहा दे आखिर प्रेम भावनाओं में वो ताकत होती है कि बडे से बडे महापुरुष पर्दे के पीछे रो देते हैं।

साधारणतया सर्कस में आप लोगों ने शेरों का खेल देखा ही होगा और जू में भी यही हो रहा था सब खेल नशे का है वह चाहे आतंकवाद हो नक्सलवाद हो माओवादी हो उग्रवादी हों सभी नशेडी है।

और हमारी सरकार इस नशे का हल नहीं ढूंढ पा रही है वह नशामुक्ति अभियान चलायेंगें सराहनीय कदम है लेकिन हम में से प्रत्येक को किसी भी प्रकार के वैचारिक नशे से बचना चाहिये बेवजह ही हा मे हा नहीं मिलाना चाहिये जहां आप शब्दों का अर्थ नहीं समझ किसी के छिपे हुये उद्देश्य को नहीं समझ पाये वही से आपका अदृश्य रूप से धोखा खाना शुरू हो जाता है जैसे जादूगर की नगरी से धोखा खा कर आते है क्यूंकि वहां सिर्फ और सिर्फ जादू होता है जादूगर अपनी कला दिखाता है और आप तीन घंटे बाद खाली दिमाग खाली हाथ पापकार्न खा के निकल आते है।

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

मनोविज्ञान एवं शब्दों की जादूगरी

एक दिन मैं अर्जेंटीना गया था यूं ही उडते हुये एक रात को अर्जेंटीना के ब्यूनॉस एयर्स शहर सुबह सुबह पहुच गया था वहां की खूबसूरत वादियों में खो गया था वास्तव में अर्जेंटीना का ब्यूनास एयर्स शहर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिये पहचाना जाता है।

यहां चूहे से लेकर खरगोश और कछुये से लेकर हांथी शेर भालू सभी प्रकार के जीव जंतु पाये जाते है।

एक दिन ब्यूनास कि सिटी बस में यात्रा करते हुये वाचनालय की ओर जा रहा था तभी बस में बैठे हुये एक सहयात्री से बातों ही बातों में ब्यूनास की प्राकृतिक सुंदरता और जानवरों की बातें करने लगा।

हम बातों बातों में अच्छे मित्र हो गये थे मुझे ऐसा लगने लगा था कि मेरा उसका रिश्ता आज और अभी कुछ पलों का नहीं जन्मों जन्मों का रिश्ता हो और वह एक महिला मित्र थी सुंदरता की बेमिशाल मूरत थी उसकी नीली नीली आंखें मुझे बहुत आकर्षित कर रहीं थी।

उसकी काया  चांद जैसी सफेदी की चादर से ढकी हुयी थी और खूबसुरत चेहरे में चांद का दाग था काले तिल के रूप में जो उसकी सुंदरता में चार चांद लगा रहा था।

अब तक मेरा मन उसकी तरफ आकर्षित हो चुका था मुझे भी ज्ञात नहीं कि वह मुझसे ही इतनी बातें क्यूं किये जा रही थी उसने बातों बातों में ब्यूनास शहर के लूजान नामक जू की चर्चा की वह कहने लगी मैं वहीं जा रही हूं क्या तुम मेरे साथ चलोगे।

उसने शक्कर जैसी मीठी आवाज में मनमोहक प्यार की चासनी मिलाते हुये कहा था मैं क्या नारद भी होते तो हे प्रिये कह के तैयार हो जाते।

मैने भी मन ही मन उसे 'हे प्रिये' कहा और हां में सर हिलाकर सांकेतिक हां कह दिया फिर हम बस से उतर चुके थे हल्के हल्के कदमों से वह राजकुमारी की तरह चल रही थी टाईट जींस और गुलाबी टाईट टीशर्ट में बला की खूबसूरत लग रही थी मेरा मन हिजकोले मारने लगा था परंतु मैने कुछ बुरा नहीं सोचा था मित्रता से अधिक कुछ सोच भी नहीं सकता था और सुंदरता का वर्णन करना कोई बुरा काम नहीं है जो जैसा है वैसा कहने में बुराई किस बात की गुलाब को गुलाब ही तो कहेंगें।

वह मेरी तरफ चेहरा घुमाकर अपनी नीली नीली आंखें मेरी काली काली सफेद आवरण की आंखों में झांककर बोली पता है तुम्हें मैं यहां क्यूं आयी हूं।

मुझे क्या पता मैं तो आपके साथ सैर करन आ गया इतनी सुंदर हो तो मेरी सैर सपाटा भी खूबसूरत हो गयी वह कहने लगी अरे बुद्धू यहां हम शेर की सवारी करते है मैं अचरज में पड गया कि अबतक एक ही कहानी पढी थी कि भारत राष्ट्र में भरत नाम के वीर बालक ने शेर के दांत गिन लिये थे और शदियों से उसकी वीरता के चर्चे है।

अब इस वीरांगना का क्या नाम है अबतक तो मैने रानी लक्ष्मीबाई कर्मावती जैसी वीरांगनाओं को जानता था लेकिन ये खूबसूरत नवयौवन की लडकी इसके पास तो तलवार भी नहीं थी सिर्फ कंधे में लटकता हुआ महरूम रंग का खूबसूरत बैग था।

मैं संकोची स्वभाव का हूं मुझे नाम से क्या मतलब सिर्फ काम से मतलब है "नाम में क्या रखा है यारों मेरा काम देखों यारों"

हम जू में प्रवेश कर चुके थे वहां एक से बढकर एक खूबसूरत कपल प्यार में मसगूल थे कोई अपनी प्रेयसी का हाथ हाथों में थामे था तो कोई हंथेलियों को हंथेलियों में भरे था और कंधों में सर रखकर हांथों से सहलाते हुये प्रेम का एहसास कर रहे थे झाडियों के बीच में मैने वहां प्रेम की बरसात देखी जो प्रेम हमारे यहां वर्जित है धूम्रपान की तरह सार्वजनिक स्थान पर करने पर दो सौ रूपये का जुर्माना है और इज्जत का सवाल है साहब इसलिये बडे रहीश लोगों के लिये फाईव स्टार है और वही से किसी कालगर्ल का नाम सामने आ जाता है बडे लोग फिर भी पैसे की हनक में इज्जत बचाने में कामयाब हो जाते है "ये है मेरा इंण्डिया"

हां तो हम शेर की सवारी की बात कर रहे थे अचानक से मेरी नजर पडी अरे यहां तो वास्तव में लोग शेर की सवारी कर रहे थे मैं आश्चर्यचकित हो गया कि ये कहां आ गया मैं वीरो के संसार में इतने सारे वीर वीरांगनायें और खूंखार बब्बर शेरों का सर नीचे झुका हुआ है ऐसा लग रहा है शेर बब्बर शेर शर्मिंदा हो रहे है और इंसान ने इन बब्बर शेरों पर विजय प्राप्त कर ली हो।

एक बार मुझे शक हुआ ये शेर है भी या नहीं कहीं आर्टिफिशियल तो नहीं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के माध्यम से तो नहीं चलते जैसे ही मैने छू कर देखा हल्की सी गुडगुडाहट की आवाज आयी छुवन से एहसास हुआ कि वास्तव में शेर नहीं बब्बर शेर ही है।

फिर मैने विचार किया कि क्या मैं भी सवारी कर सकता हूं वहां खडे एक ब्यक्ति ने कहा "यस व्हाय नाट" मेरे लिये अजूबा फिर वो बोला "ये हैव पेड सर्विस चार्च" अब ये क्या बला थी मैने कहा "हाऊ मैनी?"।

उसने कहा सिक्सटीन हंड्रेड" मै समझ चुका था भारतीय मुद्रा में सोलह सौ रूपये देने थे और शेर की सवारी करनी थी बातों ही बातों में पता चला कि इन बब्बर शेरों को ट्रेनर द्वारा ट्रेनिंग दी जाती है कि यह इंसान के साथ अच्छा ब्यवहार करें और खूंखार बब्बर शेरों को सीधा वा सरल बना दिया जाता है।

जो खूंखार हैं उन्हें इंसान ने ट्रेनिंग देकर सीधा सरल सहज बना दिया और वह शिकार नहीं करते बल्कि इंसान उस पर सवारी करने लगा यही मनोविज्ञान है और इंसान की ताकत बुद्धि विवेक का परिचय है।

मैं सोच रहा हूं कि खूंखार शेरों को सहज सरल बनाया तो क्या ऐसी कोई ट्रेनिंग नहीं है इंसान के पास जो खूंखार आतंकवादियों नक्सलवादियों निर्लज्ज बलात्कारियों कमीने लोफरों को और किसी खाश विचारधारा के नशे से प्रेरित मेरे उद्दंड साथियों को सहज सरल बनाया जा सके।
जब कुछ आतंकवादी नक्कसलवादी ट्रेनिंग के द्वारा भावनाओं को हिंसात्मक बनाकर एक इंसान को हैवान बना देते है तो हमारी सरकारें कोई ऐसी ट्रेनिंग की खोज क्यूं नहीं करती कि हम हैवान को इंसान बना सकें क्यूंकि भले ओसामा को मार दो कसाब को फांसी दे दो अफजल गुरू को लटका दो फिर भी बगदादी का जन्म हो जाता है और पेशावर से लेकर कोकराझार तक मासूमों निर्दोषों की हत्यायें हो रही है कुछ तो हल निकालना चाहिये आप सभी विचार कर सकते हैं।

नोट - मैं अर्जेंटीना नहीं गया  सिर्फ एक अखबार में ब्यूनास शहर के लुजान जू में हो रही शेर की सवारी की खबर पढी थी और उस खबर के आधार पर सब काल्पनिक है आज मैं कहूं कि मैं अर्जेंटीना गया था तो आपको शक होगा हो सकता है आप कहो कि एयरटिकट दिखाओ लेकिन अगर कोई बडी उम्र का बडे ओहदे का ब्यक्ति ऐसे ही खबर पढ कर कल्पनाओं के महासागर में डुबोकर पूरे विश्व की सैर करा दे तो क्या आप दूध में कितना पानी मिला है बिना मशीन के जांच कर पायेंगें इसलिये आप जिसे भी पढो जिसका भी अनुकरण करो सबसे पहले अपने बुद्धि विवेक का प्रयोग करो ताकि आप छले ना जाओ शब्दों पर पैनी निगाह रखिये और भविष्य का ध्यान रखिये।

हमारे अटल जी

मेरे मन की मूरत मेरे नैनों में बसी मूरत ज्ञान के प्रकाश की मूरत मेरे प्रिय कविवर आज मन प्रफुल्लित है मन में मुस्कान है एक महान ब्यक्तित्व का जन्मदिन जो है।

अटल जी वह मूरत है जिन्हें देखते ही शब्दों के बांध फूट पडते है जिन्हें देखते ही सामाजिक चिंतन स्वयमेव हृदय को घर कर लेता आज का दिन यह दिन नहीं एक महान दिन एक शुभ दिन है आज सूर्य की किरणों के साथ अटल जी की ज्ञान की किरणें बिखर रही है।

अटल जी के ब्यक्तिव का प्रकाश चहुं ओर फैल रहा है अटल जी आप मौन हो लेकिन आपका यह मौन राष्ट्र को दिशा दे रहा है आपके ब्यक्तित्व के आभामंडल में हम नवयुवक कदम पे कदम बढाये जा रहे है।

नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं। मैं गाना कभी नहीं गाता मानों ईश्वर ने मुझे गाने के लिये बनाया ही नहीं है मुझे सुर और ताल दिया ही नहीं है पर बचपन का छब्बीस जनवरी के दिन अपने विद्या मंदिर में कक्षा पांच में गाया हुआ गाना आज याद आ रहा है___

"मां मुझको भी तलवार मंगा दो मैं भी लडने जाऊंगा" निश्चित रूप से यही मेरा पहला और अंतिम गाना था जब मुझे श्री मोतीलाल पांडे जी ने पांच सौ एक रूपये बतौर पुरूष्कार दिये थे।

अब भी अपनी बेसुरी आवाज में कभी कभी गुनगुना लेता हूं चुपके चुपके चोरी चोरी एक ही गाना __

"जरा याद करो कुर्बानी जो शहीद हुये थे उनकी जरा याद कुर्बानी" यह गाना स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के दिन मेरी प्रतिस्पर्धी छात्रा अपनी लतामंगेशकर जैसी आवाज में पूरे दर्द के साथा सुर और लय के साथ गाया करती थी।

आज ऐसा लगता है कि वह समय है आज अटल जी के जन्मदिन को भारत रत्न मिलने की खुशी में हम सभी नवयुवकों को शहीदों की कुर्बानी को याद करते हुये जातिवाद भ्रष्टाचार दलालीकरण के खिलाफ शब्दरूपी तलवार उठा लेनी चाहिये और विचारों के माध्यम से कुरीतियों को छिन्नभिन्न कर डालना चाहिये जिससे राष्ट्रवाद  मजबूत हो और अखंड भारत का सपना साकार हो सके।

महापुरुष अटल जी के सपनों का भारत प्रकाशमय भारत क्यूंकि भारत का अर्थ ही है प्रकाश वही जो अपने प्रकाश में संपूर्ण विश्व को समाहित कर ले।

अटल जी का जन्मदिन तभी सार्थक होगा जब हम नवयुवक उनके विचारों का अनुकरण करें उनकी सरलता और सहजता को अपने आप में समाहित कर लें उनके सरल शब्दों को समझें उनके शांति के संदेश को आगे बढायें और राष्ट्रवाद की धुरी को मजबूत करें।

अटल जी जैसा साहस रखें पोखरण का परमाणु परीक्षण एक साहसी कदम था संपूर्ण विश्व की जासूसी निगाहों पर काली पट्टी बांध दी थी अटल जी ने और अपनी नेतृत्व क्षमता से विपक्ष को भी शांतिमुग्ध कर दिया था अपने ब्यक्तित्व से विपक्षी नेताओं के हृदय में एक अद्वितीय सम्मान कायम कर रखा था।

भारतीय राजनीति में शायद ही किसी नेता को अटल जी जैसा सम्मान लिये क्यूंकि माननीय भारत रत्न स्वयं एक रत्न है अपने ब्यक्तित्व के रत्न है ऐसी महानविभूति के जन्मदिन पर हृदय स्वयं पुलकित रहता है आपके साहस आपके सम्मान का कायल सिर्फ मैं नहीं संपूर्ण भारत की जनता है आज भी आप सभी के हृदय में हो और कर भी रहोगे।

आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं। जय हिंद

जय जवान जय किसान जय विज्ञान।

आज Rajeev Tiwari Yuwa Manch के कार्यकर्ताओं  के द्वारा शंकर बाजार कर्वी में दृष्टि संस्था में चल रहे दृष्टिबाधित कन्याओं के साथ अटल जी का जन्मदिन उन्हें कापी पेन और फल वितरण वा केक काटकर तथा दीप प्रज्वलित करते हुये दोपहर 12:00 बजे मनाया जाना निश्चित हुआ आप युवासाथी ANuj Hanumat Dwivedi जी से उनके मोबाइल नंबर 09792652787 पय संपर्क कर सकते है।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

क्या ऐसे ही होगी मासूमों की हत्या हैवान को इंसान बनाओ क्यूंकि इंसान ही हैवान बनते है

एक दिन मैं अर्जेंटीना गया था यूं ही उडते हुये एक रात को अर्जेंटीना के ब्यूनॉस एयर्स शहर सुबह सुबह पहुच गया था वहां की खूबसूरत वादियों में खो गया था वास्तव में अर्जेंटीना का ब्यूनास एयर्स शहर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिये पहचाना जाता है।

यहां चूहे से लेकर खरगोश और कछुये से लेकर हांथी शेर भालू सभी प्रकार के जीव जंतु पाये जाते है।

एक दिन ब्यूनास कि सिटी बस में यात्रा करते हुये वाचनालय की ओर जा रहा था तभी बस में बैठे हुये एक सहयात्री से बातों ही बातों में ब्यूनास की प्राकृतिक सुंदरता और जानवरों की बातें करने लगा।

हम बातों बातों में अच्छे मित्र हो गये थे मुझे ऐसा लगने लगा था कि मेरा उसका रिश्ता आज और अभी कुछ पलों का नहीं जन्मों जन्मों का रिश्ता हो और वह एक महिला मित्र थी सुंदरता की बेमिशाल मूरत थी उसकी नीली नीली आंखें मुझे बहुत आकर्षित कर रहीं थी।

उसकी काया  चांद जैसी सफेदी की चादर से ढकी हुयी थी और खूबसुरत चेहरे में चांद का दाग था काले तिल के रूप में जो उसकी सुंदरता में चार चांद लगा रहा था।

अब तक मेरा मन उसकी तरफ आकर्षित हो चुका था मुझे भी ज्ञात नहीं कि वह मुझसे ही इतनी बातें क्यूं किये जा रही थी उसने बातों बातों में ब्यूनास शहर के लूजान नामक जू की चर्चा की वह कहने लगी मैं वहीं जा रही हूं क्या तुम मेरे साथ चलोगे।

उसने शक्कर जैसी मीठी आवाज में मनमोहक प्यार की चासनी मिलाते हुये कहा था मैं क्या नारद भी होते तो हे प्रिये कह के तैयार हो जाते।

मैने भी मन ही मन उसे 'हे प्रिये' कहा और हां में सर हिलाकर सांकेतिक हां कह दिया फिर हम बस से उतर चुके थे हल्के हल्के कदमों से वह राजकुमारी की तरह चल रही थी टाईट जींस और गुलाबी टाईट टीशर्ट में बला की खूबसूरत लग रही थी मेरा मन हिजकोले मारने लगा था परंतु मैने कुछ बुरा नहीं सोचा था मित्रता से अधिक कुछ सोच भी नहीं सकता था और सुंदरता का वर्णन करना कोई बुरा काम नहीं है जो जैसा है वैसा कहने में बुराई किस बात की गुलाब को गुलाब ही तो कहेंगें।

वह मेरी तरफ चेहरा घुमाकर अपनी नीली नीली आंखें मेरी काली काली सफेद आवरण की आंखों में झांककर बोली पता है तुम्हें मैं यहां क्यूं आयी हूं।

मुझे क्या पता मैं तो आपके साथ सैर करन आ गया इतनी सुंदर हो तो मेरी सैर सपाटा भी खूबसूरत हो गयी वह कहने लगी अरे बुद्धू यहां हम शेर की सवारी करते है मैं अचरज में पड गया कि अबतक एक ही कहानी पढी थी कि भारत राष्ट्र में भरत नाम के वीर बालक ने शेर के दांत गिन लिये थे और शदियों से उसकी वीरता के चर्चे है।

अब इस वीरांगना का क्या नाम है अबतक तो मैने रानी लक्ष्मीबाई कर्मावती जैसी वीरांगनाओं को जानता था लेकिन ये खूबसूरत नवयौवन की लडकी इसके पास तो तलवार भी नहीं थी सिर्फ कंधे में लटकता हुआ महरूम रंग का खूबसूरत बैग था।

मैं संकोची स्वभाव का हूं मुझे नाम से क्या मतलब सिर्फ काम से मतलब है "नाम में क्या रखा है यारों मेरा काम देखों यारों"

हम जू में प्रवेश कर चुके थे वहां एक से बढकर एक खूबसूरत कपल प्यार में मसगूल थे कोई अपनी प्रेयसी का हाथ हाथों में थामे था तो कोई हंथेलियों को हंथेलियों में भरे था और कंधों में सर रखकर हांथों से सहलाते हुये प्रेम का एहसास कर रहे थे झाडियों के बीच में मैने वहां प्रेम की बरसात देखी जो प्रेम हमारे यहां वर्जित है धूम्रपान की तरह सार्वजनिक स्थान पर करने पर दो सौ रूपये का जुर्माना है और इज्जत का सवाल है साहब इसलिये बडे रहीश लोगों के लिये फाईव स्टार है और वही से किसी कालगर्ल का नाम सामने आ जाता है बडे लोग फिर भी पैसे की हनक में इज्जत बचाने में कामयाब हो जाते है "ये है मेरा इंण्डिया"

हां तो हम शेर की सवारी की बात कर रहे थे अचानक से मेरी नजर पडी अरे यहां तो वास्तव में लोग शेर की सवारी कर रहे थे मैं आश्चर्यचकित हो गया कि ये कहां आ गया मैं वीरो के संसार में इतने सारे वीर वीरांगनायें और खूंखार बब्बर शेरों का सर नीचे झुका हुआ है ऐसा लग रहा है शेर बब्बर शेर शर्मिंदा हो रहे है और इंसान ने इन बब्बर शेरों पर विजय प्राप्त कर ली हो।

एक बार मुझे शक हुआ ये शेर है भी या नहीं कहीं आर्टिफिशियल तो नहीं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के माध्यम से तो नहीं चलते जैसे ही मैने छू कर देखा हल्की सी गुडगुडाहट की आवाज आयी छुवन से एहसास हुआ कि वास्तव में शेर नहीं बब्बर शेर ही है।

फिर मैने विचार किया कि क्या मैं भी सवारी कर सकता हूं वहां खडे एक ब्यक्ति ने कहा "यस व्हाय नाट" मेरे लिये अजूबा फिर वो बोला "यू हैव पेड सर्विस चार्च" अब ये क्या बला थी मैने कहा "हाऊ मैनी?"।

उसने कहा सिक्सटीन हंड्रेड" मै समझ चुका था भारतीय मुद्रा में सोलह सौ रूपये देने थे और शेर की सवारी करनी थी बातों ही बातों में पता चला कि इन बब्बर शेरों को ट्रेनर द्वारा ट्रेनिंग दी जाती है कि यह इंसान के साथ अच्छा ब्यवहार करें और खूंखार बब्बर शेरों को सीधा वा सरल बना दिया जाता है।

जो खूंखार हैं उन्हें इंसान ने ट्रेनिंग देकर सीधा सरल सहज बना दिया और वह शिकार नहीं करते बल्कि इंसान उस पर सवारी करने लगा यही मनोविज्ञान है और इंसान की ताकत बुद्धि विवेक का परिचय है।

मैं सोच रहा हूं कि खूंखार शेरों को सहज सरल बनाया तो क्या ऐसी कोई ट्रेनिंग नहीं है इंसान के पास जो खूंखार आतंकवादियों नक्सलवादियों निर्लज्ज बलात्कारियों कमीने लोफरों को और किसी खाश विचारधारा के नशे से प्रेरित मेरे उद्दंड साथियों को सहज सरल बनाया जा सके।
जब कुछ आतंकवादी नक्कसलवादी ट्रेनिंग के द्वारा भावनाओं को हिंसात्मक बनाकर एक इंसान को हैवान बना देते है तो हमारी सरकारें कोई ऐसी ट्रेनिंग की खोज क्यूं नहीं करती कि हम हैवान को इंसान बना सकें क्यूंकि भले ओसामा को मार दो कसाब को फांसी दे दो अफजल गुरू को लटका दो फिर भी बगदादी का जन्म हो जाता है और पेशावर से लेकर कोकराझार तक मासूमों निर्दोषों की हत्यायें हो रही है कुछ तो हल निकालना चाहिये आप सभी विचार कर सकते हैं।

नोट - मैं अर्जेंटीना नहीं गया  सिर्फ एक अखबार में ब्यूनास शहर के लुजान जू में हो रही शेर की सवारी की खबर पढी थी और उस खबर के आधार पर सब काल्पनिक है आज मैं कहूं कि मैं अर्जेंटीना गया था तो आपको शक होगा हो सकता है आप कहो कि एयरटिकट दिखाओ लेकिन अगर कोई बडी उम्र का बडे ओहदे का ब्यक्ति ऐसे ही खबर पढ कर कल्पनाओं के महासागर में डुबोकर पूरे विश्व की सैर करा दे तो क्या आप दूध में कितना पानी मिला है बिना मशीन के जांच कर पायेंगें इसलिये आप जिसे भी पढो जिसका भी अनुकरण करो सबसे पहले अपने बुद्धि विवेक का प्रयोग करो ताकि आप छले ना जाओ शब्दों पर पैनी निगाह रखिये और भविष्य का ध्यान रखिये।

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

मेरी मधु

आज मैं अपना चश्मा उतार के लिख रहा हूं क्यूंकि मैं नहीं चाहता की आज कोई आवरण रहे।

दिल से निकले हुये शब्दों को उनकी पवित्रता को खुली आंखों से मैं स्वयं देखना और एहसास करना चाहता हूं।

आज मैं मित्रता रिश्ते की कल्पना में डूब गया हूं भावनाओं के जल में तैर रहा हूं खुले आसमान में सूर्य के मधुर ताप में मुझे भावनाओं के नीर में तैरना बहुत सुखद एहसास दे रहा है।

मैं अपने काल्पनिक कहानी के मित्र को क्या नाम दूं और अगर मैं अपने काल्पनिक मित्र को एक नवयुवती मित्र बना दूं तो कहानी दिलचस्प हो जायेगी और लिख रहा हूं फेसबुक पर तो वह नवकिशोरी मित्र फेसबुक से ही हो तो कहानी की दिलचस्पी में मधु की चासनी आ जायेगी।

आहा मधु, हां मधु की मिठास मैने तो यूं ही शहद की मिठास को याद करते हुये, शहद शब्द की जगह मधु नाम ले लिया था तो क्यूं ना अब अपनी मित्र को मधु नाम दे दूं।
उसके ऊपर मधु नाम कितना प्यारा लगेगा यह मैने भी आज तक नहीं सोचा था सच में उसकी आवाज में वो मिठास है मुस्कान में वह मादकता है कि जब जब उसकी आवाज सुनी उस मिठास से मेरा हृदय पुलकित हो उठता है और मुस्कुराहट देखकर मेरी आंखें बंद होने लगती है पता है क्यूं मैं कैसे कहूं लेकिन सच यही है कि मैं उसकी मुस्कान के नशे में खोने लगता हूं।

दिल और धडकनों के बीच अजीब सी सुरसुराहट होने लगती है और पेट में उस वक्त गुदगुदी होने लगती है जब उसका सुंदर सा चेहरा भीनी भीनी मुस्कान के साथ मुझे दिखता है और वह प्यार से अपने कण्ठ से कोयल की तरह मुझे हाय बोलती है।

मैं स्तब्ध रह जाता हूं एक पल के लिये ठहर सा जाता हूं मेरे होंठ आपस में चिपक जाते है मेरे गले से आवाज निकलने को होती है पर मैं कुछ पल बोल नहीं पाता बडी मुश्किल से मैने भी हल्की सी आवाज में हलो कहा वो भी सर के साथ पलकें झुकाते हुये और खो गया था उससे मिलने की खुशी में।

सच में मेरा झूम जाने का मन कर रहा था पर अफसोस वहां कोई एकांत नहीं था खचाखच भरे हुए चौराहे में मैं कैसे झूमता आखिर ये जालिम दुनिया मेरी खुशी को देखकर उस पर नजर जो लगा देती और मेरी मां ने मुझे काजल देकर भी नहीं भेजा था कि काजल की एक टिपकी अपने और उसके लगा देता जिससे चौराहे मे विचरण कर रहे नजरबंटों की नजर ना लगती।

जब मैं उससे मिला तो एक पल को मन किया कि उसे गले लगा लूं लेकिन वो एक नवयुवती है और मैं नवयुवक हूं और भरे चौराहे में गले कैसे लगाता मैं भी कपोल कल्पनाओं में खो जाता हूं क्या वो मुझे गले लगाती और वो भी चौराहे में कभी नहीं क्यंकि वह भारतीय संस्कृति की महिला है उसके लिये मान मर्यादा रिश्तों में पवित्रता यह सब बहुत मायने रखता है।

हां एक बार अगर कहीं एकांत में मुलाकात हुयी होती थोडा और समय होता कुछ और देर बातें कर लेता थोडा आत्मविश्वास आ जाता तब शायद मधु से कह पाता उसकी हथेलियों को अपनी हंथेलियों में भर लेता और नजरें नीचे झुका कर आह यह क्या मेरी तो सांसें तेज हो गयी कैसे कह पाऊंगा अपनी गुलाबी मधु से कि क्या वह मुझे अपने गले से लगायेगी ?

पश्चिमी सभ्यता में गले लगना कोई तोप चीज नहीं है यह काम छूमंतर में हो जाता है परंतु भारतीय संस्कृति में एक लडका और एक लडकी कहीं गले मिल लें और कोई आंदोलनकारी देख ले तो बाप रे बाप ब्रेकिंग न्यूज और दिल्ली के रामलीला मैदान मे जनता परिवार का धरना प्रदर्शन चालू हो जायेगा।

खाप पंचायत मौत का फरमान सुना देगी या समाज से बेदखल कर देगी क्या है ना देश और समाज के बारे में सोचता हूं तो प्रेम के बीच में ये राजनीति भी घुस आयी नहीं नहीं मेरी गलती नहीं वास्तव में प्रेम के बीच में राजनीति ने जबरदस्ती दखल दिया है।

मुझे क्या करना है मैं तो अपनी मधु के साथ हूं उसके साथ रहने का सुखद एहसास कर रहा हूं।

यह तो बताना भूल ही गया कि मधु मुझे पहली बार मिली थी एक शादी समारोह में जब मैने उसे पहली बार देखा था तब वह अपनी सखियों के साथ खाना खा रही थी मैं उसे पहचानने की कोशिश कर रहा था लेकिन तबतक वह मुझे पहचान चुकी थी फिर थोडी सी बातें हुयी दुनिया समाज लोगों की बातों के डर से आगे बढ लिया मैं किसी ना किसी से मुलाकात कर रहा था पर दिल मधु के लिये तडप रहा था।

मेरी आंखें स्वचलित हो गयी थी वह अपने आप मधु की तरफ एकटक निगाह से पहुच जाती थी और मधु के मुस्कुराते हुये चेहरे पर टिक जाती थी लेकिन जैसे ही मधु की आंखें मेरी तरफ निहारने लगती तो मेरी आंखें तुरंत नजरें चुरा लेती और ऐसा करती कि जैसे मधु को एकटक निगाह से निहार ही नहीं रही थी ये नजरे भी बडी चतुर होती है।

मैं स्वयं को रोक नहीं पाया और हल्के हल्के कदमों से चोरी चोरी टहलते हुये यूं ही पहुचा मधु के पास और बस एक सीधे सरल स्वभाव के लडके की तरह बैठ गया हम दोनों के बीच में ज्यादा फासला नहीं था बित्ते भर का फर्क था और महक सकता था मधु के देह की खुशबू को उसकी मुस्कान से तो वैसे भी कहर ढा रही थी बस कुछ बातें की और फिर वही जमाने का भय फिर क्या मैं मन मसोस कर उठ खडा हुआ और दुखी मन से अपनी टेबल पर आके बैठ गया था पर चोरी चोरी देखने का सिलसिला बंद नहीं हुआ।

मैं उस समारोह से वापस आ गया इस कशिश के साथ कि ज्यादा देर तक बैठ नहीं पाया बातें नहीं कर पाया लेकिन मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब मेरे मोबाइल की घंटी बजी ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग और जैसे ही मोबाइल जेब से निकाला था वह मेरी दोस्त मधु का काल था और मैंने झूम करके मन ही मन खुशियां मना ली।

हैलो हां मधु ओह आपका काल आया।
उधर से मधु की मीठी मीठी आवाज आयी हां मैं मधु फिर हमारी बातें होने लगी और मैं बात करके बहुत खुश हुआ कि चलो मधु को मुझ में कुछ अच्छाई जरूर दिखी जो उसने मुझे फोन किया अब मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था एक अच्छी दोस्त जो मिली थी।

कहते है जीवन मे अच्छा दोस्त मिल जाये तो जिंदगी में खुशियों का अंबार लग जाता है।

मैने सोचा भी नहीं था कि कोई मुझे इतना मानेगा कि खुद होके मिलने को सोचे और यह पूछे कि आपकी प्लेन कब है मैं उससे पहले मिलना चाहती हूं लेकिन दुर्भाग्य टिकट लेने की एक समस्या थी और मेरा दुर्भाग्य मेरे सामने मुझे चुनौती दे रहा था एक फिर मैं अपने दुर्भाग्य से लड रहा था।

आज मधु मिलना चाहती थी और सामने समय की समस्या लेकिन अगली सुबह दुर्भाग्य से लडा और साथ दिया मधु ने मैं टिकट लेकर वापस आ चुका था और मधु से बात की फिर मधु अपने लंच टाईम में अपनी हांडा सिटी से सिटी के ट्रैफिक को चीरते हुये आ गयी इसको ही कहते है सच्चाई जो यह बता सके कि हां हम मित्र है।

जबकि सोचने वाले सोच समझ सकते थे कि नवयुवती और नवयुवक के बीच मित्रता कैसे संभव है हमारे यहां सबसे पहले और अंतिम निर्णय में एक लडका और लडकी के संबंध को आशिकी के तराजू मे ही तौलते है ही।

लेकिन मधु आज के जमाने की है वह निडर भी है कोई कुछ भी सोचे लोगों का काम है सोचना पर जमाने से डर तो लगता है।

खैर यह मेरी जिंदगी का पहला अवसर था जब कोई नवयुवती मित्र मुझे विदा करने आयी थी और इतना मान सम्मान प्रेम स्नेह दिया।

मधू मेरी वह मित्र है जिससे मैने अपने जीवन के दर्द भी कहे है और उसने उस दर्द को अपने ही सीने में अपने ही जीवन के राज की तरह दबा कर रखा है।

मैने सुनी थी एक कहावत कि महिलाओं के पेट में बात नहीं पचती पता नहीं हो सकता है पर मधु कमाल की है मेरे राज को अपने सीने में अपने सीने से लगाकर यूं ही छिपा लिया है कि जमाने को पता ना चले और जमाने के लोग हंस गा न सकें अब यह तो तय हो चुका है कि कहावत कोई भी हो सभी पर सत्य नहीं प्रतीत होती मधु की बात पचाने की क्षमता ने महिलाओं पर कही गयी इस कहावत को झुंठला दिया था और क्या लडके/पुरूष हर बात को पचा ही लेते हैं बल्कि चौराहे पर जोर जोर से चिल्ला के ठहाके मारते हुये पुरूष पर्याप्त देखे जा सकते है।

जब मधु मिलने आयी थी पिंक सूट में खूबसूरत परी की तरह लग रही थी जब वह मेरी तरफ आ रही थी क्या कयामत ढा रही थी उसकी सुंदरता के साथ जब उसकी सीरत मिल जाती है तो वह मुझे दुनिया की किसी भी लडकी से ज्यादा खूबसूरत और परी नजर आती है मेरे लिये तो मेरी मधु बार्बी डाल है।

क्या ऐश्वर्या क्या कैटरीना नो करीना नो करिश्मा सिर्फ और सिर्फ मेरी मधु मेरी दोस्त सुंदरता की बेमिशाल मूरत है और उसकी सुंदरता में चार चांद लगाती है उसकी सीरत मित्रता निभाने की सोच जिस तरह से आज तक उसने मित्रता निभायी पूरे ईमान के साथ हो सकता है किसी और की इतनी प्यारी मित्र हो इस दुनिया में पर मेरी तो मधु ही है।

(कहानी पूर्णतया कल्पनाओं पर आधारित है कृपया कयास ना लगायें)

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

महिला सशक्तिकरण वा स्वतंत्रता एवं स्वछंदता

आजकल फेसबुक में नारी स्वतंत्रता नारी सशक्तिकरण की बातें एक आंदोलन का रूप ठीक उसी तरह से लेती जा रही हैं जैसे अंग्रेजों से गुलाम भारत को आजाद कराना था।
ऐसे विचार देख सुन पढकर बहुत खुशी होती है कि नारी अब अबला नहीं सबला होने जा रही है। जिस राष्ट्र में सदियों से कहा जाता है "यत्र नारी पूजयेत् तत्र रमंते देवता" उसी राष्ट्र में नारी की दुर्दशा हो रही हो आये दिन बलात्कार हत्या छेडखानी के मामले प्रकाश में आते हैं। पडोस से लेकर सडक तक और आफिस तक जहां देखें वहीं नामर्दों का घूरना और वासना की लालशा जाग्रत रहती है इन सबके खिलाफ नारी अब जाग्रत हो रही है तो बुराई क्या है।
नारी अब ड्रेसकोड के विरूद्ध भी जाग्रत हो रही है अब साड़ी और नारी की स्वछंदता बढती जा रही है वह साड़ी में नारी नहीं दिखना चाहती उसे भी स्वतंत्रता चाहिए फुल जींस हाफ जींस फुल शर्ट हाफ शर्ट लोअर टी शर्ट पहनने की आखिर नारी क्यूं ना पहने अब पुरूष भी तो धोती कुर्ता नहीं पहनते जब धोती कुर्ता वाला पुरूष नहीं तो साड़ी वाली गुलाम मानसिकता की नारी क्यूं देखना चाहते हो ?
नारी कोई राष्ट्र नहीं जिसे गुलाम बनाओ नारी कोई संपदा नहीं जिसका तुम मर्जी अनुसार उपभोग करो नारी कोई विस्तर नहीं जिस पर जब मर्जी आये पैर पसार के सो जाओ नारी भी जीव है प्राणी है उसका सम्मान करना सीखो।
     महिला सशक्तिकरण नारी स्वतंत्रता वाले किसी एक विचार से मेरी बहुत कम पटती या यूं कह लो बहुतायत मेरे सीने में कौतुहल बनकर रहता है। नारी नशा क्यूं ना करे। अरे पुरूष वियर पीते हैं तो हम वियर क्यूं ना पिये पुरूष सिगरेट पीते तो हम सिगरेट क्यूं ना पिये हम गुटका क्यूं ना खायें अगर यही स्वतंत्रता और समानता का पैमाना है तो निडर होकर खायें पियें मुझे व्यक्तिगत कोई समस्या नहीं है लेकिन एक विचार मन में कौध सा गया महाभारत में एक कथानक है वीर अभिमन्यु अपनी मां के कोख में रहते हुए चक्रव्यूह के द्वार तोडना सीख गया था लेकिन मां बताते सो गई थी जिससे अभिमन्यु को अंतिम द्वार तोडने का ज्ञान नहीं था परंतु धर्मयुद्ध था उसे अपनी वीरता का परिचय धर्म की विजय हेतु देना आवश्यक था और परिणाम अभिमन्यु क्रूर कौरवों का शिकार हो गया।
स्त्री को प्रकृति प्रदत्त गर्भ प्रदान है और शिशु अपने अमूल्य जीवन के प्रथम नौ महीने मां के गर्भ में गुजारता है और उसी गर्भ में अभिमन्यु के सरीखे ज्ञान संस्कार अर्जित करता है अगर स्त्रियां अधिक से अधिक मात्रा या कम से कम मात्रा में वियर सिगरेट गुटका खायेगी पियेगी तो क्या गारंटी है गर्भस्थ शिशु पर उसका असर ना पडे जब मां भोजन ग्रहण करती है तो उसी भोजन का तिनका गर्भस्थ शिशु ग्रहण करके जीवित रहता है यानी कि जब मां गर्भित रहती है तृ उसके क्रियाकलापों विचार कुविचार संस्कार कुसंस्कार का असर सीधा सीधा गर्भस्थ शिशु को प्रभावित करते हैं और अगर मां किसी गलत रास्ते पर रहेगी तो हमारी आने वाली पीढियां कैसी होगी एक अभिमन्यु तो सिर्फ इसलिये मारा गया कि उसकी मां अनजाने में सो गयी थी लेकिन अगर पुरूष की गलत बराबरी के चक्कर में नारियां गलत अनुकरण करेंगी तो भविष्य में यह पूरा संसार ही जुआरी शराबी अपराधी हो सकता है क्यूंकि मां के क्रियाकलापों का असर गर्भस्थ शिशु पर अवस्य पडते हैं यह सिर्फ पुरातन आध्यात्मिक ही नहीं आधुनिक वैज्ञानिक सत्य भी है।

नोट- मैं अज्ञानी हूं अभी सीख रहा हूं मैंने कुछ गलत लिखा हो तो मेरी बहनें ,दोस्त मेरा मार्गदर्शन करना मुझे माफ करना मै आपकी प्रत्येक स्वतंत्रता के साथ हूं।

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

बुलंद शहर से ईमानदारी की आवाज बुलंद हुयी

एक सबसे बडी ताकत होती है ईमानदारी लेकिन यह ताकत बिखर गयी है भिन्नता में अपने आप तक सीमित कर दी गयी है हम ईमानदार है बस बाकी हमें क्या करना है।

बेईमानों ने हर एक ईमानदार इंसान को ऐसे ही अलग अलग किया कि आप ईमानदार सज्जन हो आप शांत रहो आपको क्या करना है ये बेईमानों की दुनिया है आपको क्या करना है बेईमान लोगों से ईमानदार डर जाता है क्यूंकि ईमानदारी अकेले रहती है परंतु अब समय आ गया है_____

ईमानदारी की ताकत का बेइमानों को एहसास कराओ, वह साहसी है वह युवा है, उसके चेहरे पर निर्भयता की चमक है , वह गरजती है वह यह साबित कर देती है कि ईमानदारी की ताकत के सामने बेइमानी को सिर और आंखें झुकाकर के रहना पडता है वह जहां जाती है एक धमक होती है एक चमक होती है भ्रष्टाचार की रूह कांपती है।

हां जी मैं बात कर रहा हूं बुलंदशहर की ईमानदारी की बुलंद आवाज डीएम बी चंद्रकला आप जब पहले मथुरा की डीएम थी तो उनकी ईमानदारी व सक्रियता की वजह से बुलंदशहर ट्रांसफर कर दिया गया मथुरा की जनता ने सरकार को पत्र लिखे लेकिन सरकार ने जनता की एक ना सुनी और ट्रांसफर कर दिया गया।

लेकिन ईमानदारी जिसके हृदय में होगी वह मशाल अंधेरे में हमेशा जलेगी बेईमानी की हवा उसे बुझा नहीं सकती कुछ दिन पहले ही एक बीडियो आप सभी ने देखा होगा जब डीएम चंद्रकला एक शिकायत पर जांच के लिये जाती है तब वहां घटिया सामग्री से बनी हुयी गढ्ढों की साम्राज्य सडक देखती है और एकदम घटिया सामग्री देखकर आग बबूला हो जाती है और साफ शब्दों में वहां के अफसर और ठेकेदारों को हडकते हुये कहती है कमीशनबाजी की भी हद होती है और सडक पर अच्छी सामग्री ही प्रयोग की जाये ऐसा भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।

आप युवा हो और एक बुढ्ढा भी युवा हो सकता है युवा का अर्थ 25 साल की उम्र होना ही नहीं होता बल्कि सोच से युवा होना चाहिये सभी ईमानदार नवयुवकों को एक मंच पर आकर ईमानदारी की ताकत बननी चाहिये और बेइमानों को भ्रष्टाचार के भस्मासुर को खत्म कर देना चाहिये।

अगर अफसर ऐसी ही ईमानदारी दिखायें जनप्रतिनिधि सहयोग करें तो भ्रष्टाचार चौबीस घंटे और चंद दिनों में खत्म हो सकता है लेकिन सरकार नहीं करेगी जनप्रतिनिधि क्यूं करेंगे अगर करते तो मथुरा से बी चंद्रकला का ट्रांसफर नहीं होता और जनता मूकदर्शक नहीं बनती इसलिये आवश्यकता है ऐसी ईमानदारी को पहचानने की और जब कभी जनता को यह लगे की बी चंद्रकला जैसी ईमानदार अफसर का ट्रांसफर हो रहा है उसके साथ गलत हो रहा है तो जनता को सडक पर उतर आना चाहिये ईमानदार अफसरों का ट्रांसफर गैरकानूनी तरीकों से नहीं होना चाहिये।

अशोक खेमका का 42 बार ट्रांसफर हो चुका है दुर्गाशक्ति नागपाल को ईमानदारी को क्या उपहार मिला यह इतनी आसानी से कोई सरकार इसलिये कर पाती है क्यूंकि ईमानदार जनता ईमानदार नवयुवक शांति से मूकदर्शक बने रहते है अगर भ्रष्टाचार के भसमासुर को खत्म करना है तो युवाओं ईमानदारी की ताकत का एक गट्ठर बना लो फिर कोई बेईमान कोई भ्रष्ट अफसर कोई दलाल कोई जातिवादी मानसिकता का तालिबानी हृदयवाला सर उठाकर नहीं जायेगा आपके सामने नतमस्तक नजर आयेगा।

तब बी चंद्रकला , दुर्गा शक्तिनागपाल अशोक खेमका जैसे अफसर और बुलंदी से काम करेंगें उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से जो ईमानदारी की आवाज बुलंद हुयी है उसे ऐसे ही बुलंद बनाये रखने के लिये हम सभी नवयुवकों को एक साथ आवाज देनी होगी जिससे भ्रष्ट सरकार भ्रष्ट अफसर भ्रष्ट जनप्रतिनिधि और इनका भ्रष्टाचार का भसमासुर की मृत्यु हो जाये।

मैं नमन करता हूं बी चंद्रकला जैसी ईमानदारी की मिशाल नारी शक्ति को और आप ?????

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

कौन कहता है कि मुसलमान ईमानदार नहीं होते , मैं आतंकवादियों की बात नहीं करता

आप सभी को कल अपने अल्तमस शेख ए रियल किंग खान की कहानी सुनायी थी आप सभी को बहुत पसंद आयी थी और आपकी टिप्पडियों से मेरे साथ आपके ईमानदारी धैर्य साहस आदर्शवाद के किंग खान का भी उत्साहवर्धन हुआ।

आज मैने जिंदगी के संघर्षपथ को तय करने वाले असली किंग खान से थोड़ी बातें की उनसे उनकी जिंदगी की कहानी पूंछी वह कहने लगे साहब मेरे पिताजी मुझे सात साल की उम्र में छोडकर चले गये थे उनके इस दुनिया में ना रहने पर गरीबी की मार से मुझे ज्यादा पढने लिखने का अवसर नहीं मिला एक क्लास पढकर गुजरात की एक होटल में पच्चीस पैसे से नौकरी शुरू की थी तब सस्ते का जमाना था मैं था मेरी मां थी मेरे भाई चाचा के साथ रहते थे होटल में नौकरी करते हुये सवा रूपये तक मेरी सैलरी पहुंची थी फिर मैं चौदह वर्ष की उम्र में नौकरी की तलाश में भटकते हुये पुणे आ गया मैं पढा लिखा नहीं विद्यालय नहीं गया मदरसा नहीं गया लेकिन मैने जीवन में कुछ ऐसे ही पढाई की जीवन के संघर्ष की पढाई की कमाता गया सीखता गया पुणे में सवा सौ रूपये की नौकरी की और जीवनयापन करने लगा मैने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया साहब।

हम बहुत गरीब थे और आज भी गरीबी से संघर्ष कर रहा हूं बस इतना है कि एक कंपनी में चौदह हजार में मैनेजर हूं और सुबह सुबह ये चाय का ठेला लगा रहा हूं मैने पूंछा कब से आप ठेला लगा रहे हो वह कहने लगे साहब ठेला तो अभी कुछ महीने पहले लिया इसके पहले एक टेबल में प्रतिदिन चाय बनाता था और आप सभी के आते जाते धंधा बढने लगा थोडा पैसा हुआ और मैने ठेला ले लिया देखो आप सभी इस ईमानदारी की हांथ गाडी में कितनी चमक है मुझे ये हाथ गाडी में आसमान में चमकते टिमटिमाते तारों की तरह चमक दिख रही है।

मैने पूंछा और आपके बीबी बच्चे फिर उसने एक और अच्छी बात बतायी उसने कहा मैने इक्कीस साल की उम्र में शादी किया था वो भी दिन में बिना दहेज लिये किया था वह कहने लगा साहब पहले लोगों में इंसानियत बहुत थी अब तो पूना बदल गया है अब वो बात कहां रही पूना में पूना कितना बदला है यह कभी और बताऊंगा अभी तो आप यह जानों कि मेरे रियल किंग खान ने एक बेटा भी गोद लिया हुआ है उसके आगे पीछे कोई नहीं था और उस बेटे को गोद लेने के तीन साल बाद उसके घर में कन्यारत्न का जन्म होता है आज वो अपनी पत्नी अपने बेटे बेटी के साथ ईमानदारी की चादर में गरीबी से संघर्ष करते हुये अपने जीवन को जी रहा है वह कभी नहीं भटका ना तो आतंकवादी बना और ना ही नक्सलवादी बना उसे इतने पैसे की दरकार कभी नहीं रही कि वह अपना मार्ग भटकता बल्कि वह किसी भी आदर्शवाद ईमानदारी भावनाओं संबंधों की बात करने वालों से कहीं ज्यादा उच्च आदर्शों की परिपाटी पर चलकर अपने बीबी बच्चों को पाल पोष रहा है।

उसने शादी की तो दिन में की बिना दहेज के की जीवन जिया ईमानदारी से ब्यापार किया ईमानदारी से अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा अच्छे संस्कार दे रहा है वह भी ईमानदारी के खनकते सिक्को से बडी बडी नोटों में बेईमानी की 'बू' आ सकती है परंतु इसके पास ईमानदारी की नोट है।

यानी की अगर आपका आत्मबल मजबूत है आप आत्मा से संस्कारवान है अपनी मां अपनी भारत मां के प्रति ईमानदार हैं तो क्या हिंदू क्या मुस्लिम हर एक इंसान ईमानदार होता है ये है मेरा अल्तमस शेख "ए रियल किंग खान"

कौन कहता है कि महिलाओं की सोच में परिवर्तन नहीं हो रहा है

आज तीन दिन बाद कह सकता हूं कि मैं स्वस्थ हूं औषधि ने फायदा पहुंचाया आज मैं फिर से ऊर्जावान हूं।

शिक्षा और जागरूकता का आपसी संबंध है आपका मानना है जो शिक्षित है वह जागरूक है निहसंदेह हो सकता है परंतु हमें भ्रम भी है।

एक अशिक्षित व्यक्ति भी जागरूक होता है और एक शिक्षित ब्यक्ति भी जागरूकता से कोशों दूर हो सकता है और घरेलू महिलाओं के बारे में क्या कहना उन्हें वही करना होता है जो उनके पति चाहते हों और हमारे बुंदेलखंड में हमारे चित्रकूट में एक धर्मपत्नी का यही कर्तव्य है।

अब हम शिक्षित हो रहे हैं महिलायें भी शिक्षित हो रही हैं मेरी एक दीदी हैं मेरे ही जिले से पर मिली फेसबुक में ही हैं यहां तक की परिचय के मोहताज नहीं हैं क्यूंकि हमारी रिश्तेदारी भी उसी शहर में है धीरे धीरे हमारी बातें हुयी वो मेरे लिखे की प्रशंसा करने लगीं जो शायद बहुत कम लोग प्रोत्साहन दे पाते हैं।

कल शाम को दीदी से बात होने लगी दीदी कहने लगी आपकी चर्चा सिर्फ एफबी पे नहीं बाहर भी है मुझे तो यह भी नहीं पता था कि एफबी में मेरी कोई चर्चा करता है और बाहर कितनी चर्चा होती है अंदाजा नहीं था बस दीदी से कुछ लोगों ने कहा आप नहीं जानती उसे नेता है वो पर सच कहूं तो मैं नेता अभी मानता ही नहीं इसलिये आजतक पूर्ण सफेद ड्रेस नहीं पहनी सिवाय एक बार दिल्ली में।

हां तो मुझे बात दीदी की करनी थी दीदी ने कहा आप बीजेपी से हैं मैने कहा हां दीदी मैं बीजेपी से इत्तेफाक रखता हूं , दीदी कहने लगी एक बात बताऊं मैने कहा 'हां' दीदी बताईये __ मेरे पति कांग्रेस की विचारधारा से इत्तेफाक रखते हैं या कह लीजिए कांग्रेस को पसंद करते हैं लेकिन मैं बीजेपी को पसंद करती हूं या कह लीजिए बीजेपी में ही मुझे राष्ट्र का भविष्य नजर आता है मेरी अपनी मजबूरी है मैं खुलकर नहीं लिख सकती परंतु मैं राष्ट्रहित के लिये प्रतिबद्ध हूं।

आपको यह बात सामान्य लग सकती है पर मेरे लिये यह बात असाधारण है शुभसंकेत है बुंदेलखंड के लिये चित्रकूट के विकास के लिये क्यूंकि मैं उस बुंदेलखंड से हूं जहां मतदान दिवस के कुछ दिन पहले से तमाम पतिगण अपनी पत्नियों को यह समझाते हैं कि_____

देख या नंबर मां हांथी के बटन ही या वाली बटन दबा दीन्हें।

अरे कहां जाती हा सुन यंघय देख या वाली बटन तीन नंबर मां कमल क्या निशान है यहिके सामने वाली बटन दबा दीन्हें ऊं वाले भैया जीत जैईहंय तो आपन कुछ काम होई अरे आपन जातभाई आय रिश्तेदारी है देश जाय तेल लेने।

ये सुन थोई से यंघय अवय ठीक से दिखे भला गलती ना कीन्हें जात के इज्जत के बात ही या साईकिल पहिचान ले घर मां देखती हा ना साईकिल हां सदियों से साईकिल खरीदने योग्य ही तो बना पाये आपको कार कहां से दिखा पाओगे।

ये हालात हैं पहले तो बैलेटपेपर में अंगूंठा लगता था अब मशीन आ गयी तो अंगूठा अशिक्षा छिपी हुयी नजर आती है सरकार बहुत होशियार है वरना अशिक्षा की हर चुनाव में पोल खुलती।

और अगर उसी बुंदेलखंड से मेरी दीदी अपने स्वतंत्र विचार रख दें तो है ना एक भाई के लिये गौरव की बात कि अब वास्तव में परिवर्तन हो सकता है दीदी मैं जानता हूं आप समाज के सामने आकर इन बातों को नहीं कह सकती पर मैं यह भी जानता हूं आप अपने तरीके से आंतरिक रूप से जागरूकता फैलाने के लिये प्रतिबद्ध हैं और आप जैसी बहन चित्रकूट के विकास में बुंदेलखंड के विकास की क्रांति में अंदरूनी समयानुसार महत्वपूर्ण साथ दे रही हैं यह है ना महिला स्वतंत्रता वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपने मत का सही प्रयोग अपने विवेकानुसार तो क्या मैं अपनी दीदी की सोच समझ विचारों पर गर्व नहीं कर सकता और आप ????

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

फेसबुक में लिखने वालों की कमी नहीं है सभी कुछ ना कुछ लिखते हैं और लिखने वाले पाठक भी हैं लेकिन जितना मन से आप लिखते हो क्या उतने मन से आप पढते हो??

क्या आप किसी लेख को पढकर उसकी कुछ लाईन कुछ शब्दों से क्या भविष्य का आंकलन करते हैं ?
क्या आप सच और झूंठ की मिलावट का आंकलन कर पाते हैं?

दूधवाला अपने दूध में पानी मिलाये ना मिलाये पर आपको शक बना रहता है और निगाहें पैनी रहती हैं।

इसी तरह से अपने दिमाग के को केन्द्रित करिये की आप क्या पढ रहे हो और आपका लेखक आपको क्या परोस रहा है उससे समाज को फायदा है या ब्यक्तिगत लेखक को फायदा है कोई लेखक सिर्फ अपने लिये लिख रहा है या फिर उसके लेख राष्ट्र वा समाज को निहस्वार्थ भाव से समर्पित हैं।

पैसे तो डाकू भी कमा लेता है लेकिन डाकू का पैसा डाकू का ही होता है अंशमात्र शायद समाज को फायदा होता हो।

इसी प्रकार उत्तम लेख वही है जिससे सच का उजागर हो राष्ट्र को ताकत प्रदान हो राष्ट्र का भविष्य अच्छा हो और अच्छा पाठक वही है जो एक एक लाईन और शब्द का अंदाजा लगा लें कि इसका भविष्य क्या हो सकता है।

इज्जत इंसान कि की जाती है अगर उससे राष्ट्र को नुकसान हो तो अपना मत रखने की हिम्मत रखने वाला ही सच्चा और अच्छा पाठक होता है।

मैं भी एक पाठक हूं

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

एक इंसान के कितनी मां हो सकती है न

कृपया लाईक कमेंट नहीं भी करेंगें तो चलेगा क्यूंकि आज मैं बेवजह ही हंस रहा हूं क्यूंकि मेरा हंसने का मन है क्यूंकि मैने फेसबुक में आज सुबह से ही ऐसा कुछ पढा है कि जो गंभीर मुद्दे पर लिखने वाला था वह भी लिखने से पीछे हंट रहा हूं।

और लाईक और कमेंट ना करने का अनुरोध इसलिये कर रहा हूं कि यह बात भी बेवजह ही लिख रहा हूं बेवजह लिखे हुये पर लाईक कमेंट क्यूं करें आप लोग इस लिखने का कोई अर्थ नहीं हां मेरी मां जरूर इस लिखे पर भी अर्थ निकाल लेगी या निकाल लेती भले मैं कितना बडा हो जाऊं पर मां के लिये छोटा हूं मैं मूर्ख रहूं पर मां के लिये प्यारा रहूंगा क्यूंकि मुझे मेरी मां ने नौ महीने गर्भ में पाला फिर मुझे चलना सिखाया जीवन जीने के लिये संस्कार दिये।

मेरी गलती पर मुझे पीटा भी मेरे होमवर्क में मेरी सहायता भी मां ही तो एक भावनात्मक शब्द है जिससे सारी दुनिया जीती जा सकती है जैस भारत माता के भावनात्मक नाम पर बडे बडे चुनाव जीते जाते हैं हम इस धरती को मां कहते हैं इस धरती से बडी मां क्या और कौन हो सकता है बचपन से लेकर आज तक धरती मां के पल्लू में तो चिपटा रहा मैं , खेल खेल में जब मैं गिर जाता था तब मां के पल्लू की धूल मेरी कोमल देह में लग जाती थी और जब चोंट लगती थी तो मेरी जन्मदात्री मां मेरे मलहम पट्टी कर देती थी।

जो इंसान बचपन से ही भारत माता की पल्लू में लिपटा रहा आखिर उसे अपनी मां को पवित्र बनाने के लिये कुछ मौलिक लिखना चाहिये अवश्य लिखना चाहिये आखिर जन्म देने वाली मां और हर वो औरत जो मां के योग्य हो या जिसने अपना बेटा मान लिया उसके सिवाय हमारे जन्म के समय से अदृश्य रुप से अगर किसी ने हमें संभाला हमारे पैरों का भार हमारे लंबे चौडे कद का भार अगर किसी ने संभाला तो वह हमारी मां धरती मां है इस मां का हम पर कर्ज है इस मां के प्रति हमारा कर्तव्य है इसकी पवित्रता बनाये रखना हमारा कर्तव्य है।

मां का रूप कभी पिता आकाश धारण नहीं कर पाया आकाश सदैव आकाश ही रहा है धरती और आकाश में कितना फर्क कितने प्रकाश वर्ष की दूरी है यह विज्ञान भी कहता है हम और आप भी समझते हैं आखिर आकाश पुरूष है धरती औरत है , पुरूष और औरत के हृदय में ईश्वर ने भी फर्क किया है मां की ममता को मां के हथेली के एहसास को एक पिता एक पुरूष से शायद ही एहसास किया जाता हो इसीलिये प्रत्येक बेटे का जो मां से आत्मिक लगाव होता है वह एक पुरूष एक पिता से संरक्षण प्रेम मात्र होता है।

एक पुरूष और एक औरत के प्रेमत्व और ममत्व में जमीन आसमान का फर्क है आकाश , आकाश पिता है और धरती मां मां है अन्नदात्री है आकाश पूरक तो हो सकता है परंतु मां की तरह हमें पल्लू में लिपटा नहीं सकता आकाश में पहुचते भी हैं तो बडे लोग वो भी प्लेन से अपने पैसे की हैसियत से अपनी पहुंच से अपने फायदे के लिये आकाश को मां कह दें और हम मान लें तो क्यूं मान लें मां बनने हक उसी को है जो संसार के हर एक बेटे को अपने आप में समाहित कर ले जो अपने ममत्व से सब में प्यार भर दे जो बेटे का दर्द सह के भी मुस्कुराये वही तो मां है बाकी आधुनिकता के समय में मां शब्द से खेलने वालों की कमीं नहीं है असली मां धरती मां है समा जाओ मां के पल्लू में समा जाओ इस धरती मां की हथेलियों में और शांति का एहसास करो और लिखो कुछ मौलिक करो कुछ मौलिक कि यह धरती मां रक्तरंजित ना होने पाये बिखेर दो अपनी भावनाओं को सजा दो अपने आदर्शवाद की दुकान कुछ तो करो इस सच्ची पवित्र मां के लिये।।।।।।।।

रविवार, 7 दिसंबर 2014

मैं अपने घर में तो चाय पीता ही हूं परंतु प्रतिदिन एक ठेले में चाय पीने जरूर जाता हूं क्यूंकि इस चाय के टेस्ट का अपना अलग ही आनंद है क्यूंकि वह चाय भले किसी होटल की ना हो भले फाईवस्टार की ना हो वहां कोई सेलिब्रिटी नहीं आते परंतु चाय में ईमानदारी मेहनत की लाजवाब खुशबू है मैं बहुत दिनों पहले उस ठेले पर यूं ही चलते चलते एक सुबह पहुंच गया था चाय की चुस्कियां लेते हुये मेरे कानों में कुछ शब्द गूंजें ये पीछे वाली कंपनी में मैनेजर हूं मैं ओह अच्छा अच्छा फिर चाय का ठेला क्यूं???

मैं बिना पूंछे ही समझ गया कि इन्हें कुछ अधिक पैसों की आवश्यकता है तभी यह सुबह 5:15 पर जगकर सुबह 8:30 तक चाय का ठेला लगाते हैं और उसके बाद नहा धोकर अपनी कंपनी में मैनेजर बनकर जाते हैं। मेरी उंगलियां रूक रहीं हैं क्या लिखूं ऐसे ईमानदार इंसान के बारे में मेरी आंखों में आंसू आ रहे हैं ईमानदारी जहां कहीं दिखती है ऐसे ही छोटी मोटी जगहों पर दिखती है बडी बडी जगहों पर तो स्टार से लेकर सुपर स्टार तक ईमानदारी की बात करते हैं उनकी बातें बडी मीठी प्यारी होती हैं परंतु सच्चाई कितनी होती है यह वक्त ही तय करता है।
मैं जानता हूं यह ईमानदार इंसान कोई स्टार सुपर स्टार नहीं शाहरुख खान नहीं अमिताभ बच्चन नहीं राहुल नहीं ओबामा नहीं कि इसके किस्से गायें जायें इसके किस्से कहानियां कह के क्या फायदा होगा ना बालीवुड में पहचान बनेगी ना हालीवुड में ना किसी पार्टी का टिकट मिलेगा कि बाबू जी खुश हो जायेंगें तो कहीं ना कहीं सर में हाथ रख देगें तो आगे बढ जायेंगे उन्नति होगी।

आज काफी दिनों बाद डरते डरते उसका नाम पूंछा उसने कहा साहब "अल्तमस शेख" ऐसा ही कुछ कहा उसने मेरी आत्मा प्रफुल्लित हुई मेरा सीना चौडा हो गया मेरे मन ने कहा देख सौरभ ये है असली "किंग खान"

अब मैं ही कहता रहूंगा या आप भी कुछ कहोगे मैं जा रहा हूं अपने किंग खान के पास फिर से चाय पीने___

शनिवार, 22 नवंबर 2014

रिश्ते फेशबुक वा पुरातन सामाजिक रिश्ते

वास्तविकता यह है कि स्टेटस आजकल कुछ ज्यादा हो रहे हैं और मैं पिछले तीन दिनों से अपने मिशन पर काम नहीं कर पा रहा हूं क्यूंकि बार बार मन में बहुत से विचार जन्म लेते हैं लिखने को मजबूर हो जाता हूं।

मैने पहले भी लिखा था मित्रता में मीत और इत्र दोनों होना चाहिए तभी वह सही मायने में मित्रता होती है एक दूसरे की चिंता होनी चाहिए और मैं वास्तव में कुछ ज्यादा भावुक हूं जिससे मुझसे जीवन में 1-2 गलतियां भी हुई हैं लेकिन हां मैने जिसे मित्र चुना स्वयं की सोच और समझ से चुना ऐसा कभी नहीं रहा कि फला व्यक्ति फेसबुक में नरेन्द्र मोदी का दोस्त है तो वह मेरा भी दोस्त होगा अब वह अच्छा हो या बुरी मानसिकता का हो।

ऐसा भी कभी नहीं रहा कि कोई राहुल गांधी का फेसबुक मित्र हो और मैं राहुल गांधी को पसंद नहीं करता तो वह मेरा मित्र नहीं हो सकता है अगर इंसान सही है तो विचारधारा कितनी भी विपरीत हो विरोध सिर्फ विचारधारा का होगा मित्रता का नहीं।

मेरी मित्रता सूची में मेरे बहुत से मित्र हैं जो अखिलेश यादव समाजवादी विचारधारा के हैं कांग्रेसी विचारधारा के हैं पर हैं वो मेरे मित्र मैं उनकी पोस्ट पर अपना मतभेद भी व्यक्त कर देता हूं वो भी शालीनता के साथ हां मैने अपने अबतक के फेसबुक के सफर में एक ही बार अभद्रता की है क्यूंकि उस इंसान की छवि मेरी नजरों में कभी भी अच्छी नहीं रही इतना तो ईश्वर ने मुझे भी योग्य बनाया है कि इंसान का चेहरा देखकर एक हद तक पढ लेता हूं अगर उस इंसान के प्रति मेरे मन में थोड़ी भी छवि अच्छी रही होती तो मैं अभद्र ना हो जाता वो भी गुस्से में।

लेकिन मैने पिछले कुछ दिनों में 2-4 अपने ऐसे मित्र देखे जिन्होंने मुझे राहुल गांधी की विचारधारा से ना सहमत होने पर यह कह कर मित्रतासूची से हटाया कि आप राहुल के मित्र नहीं तो हमारे मित्र नहीं है मैं बहुत ही ज्यादा हतप्रभ हो गया कि आज के पहले मेरे इन परममित्र ने ऐसा कभी नहीं कहा कि मैने राहुल की वजह से आपको मित्र बनाया है वास्तव में मैं नरेन्द्र मोदी का समर्थक हूं पर मेरे मित्रों की सूची नरेन्द्र मोदी नहीं तय कर सकते।

मैं अपने मित्र चुनने को सदैव स्वतंत्र रहा हूं मैने अपनी मित्रता सूची में कभी किसी और की वजह से किसी को ना जगह दी और ना किसी की वजह से किसी को हटाया अगर मैं नरेन्द्र मोदी की वजह से किसी समाजवादी विचारधारा के मित्र को मित्रता सूची से हटाऊं तो मुझे यह समझ में आयेगा की मैं अपने स्वयं के मन को संचालित नहीं कर पा रहा हूं मैं नरेन्द्र मोदी का मानसिक गुलाम हो गया फिर और गुलामी किसी भी प्रकार की हो खतरनाक होती है।

हा मैं भी भावनाओं में बहा हूं पर मित्र बनाने और हटाने के मामले में मेरे मन के सिवाय किसी का अधिकार नहीं क्यूंकि मैं किसी का मानसिक गुलाम नहीं बनता और ऐसा होना खतरनाक होता है हमारे जीवन के लिये।
#जय_हिंद

रविवार, 2 नवंबर 2014

सोचा तो लिख ही डालता हूं हृदय से बहुत भावुक हूं तो कैसे रोकता अपनी कलम को चूंकि मैं बहुत संवेदनशील स्वभाव का हूं तो मुझे यह भी ख्याल रहता है कि कहीं मैं इतना तो नहीं लिख जाता कि आप सभी को ऊबाऊ लगता हो और मैं बेरोजगार समझ में आता हूं आपको फुरसत समझ में आता हूं सच कहूं तो मैं फुरसत नहीं रहता फेसबुक तो मैं चलते चलते भी चला लेता हूं।

लिखना सिर्फ इतना था कि मैं दिन प्रतिदन लिखता हूं जो भी मेरे मन के विचार होते हैं मैं उन्हें किसी पैमाने से मापता नहीं कि अच्छा लिखा है या बुरा लिखा है बस सिर्फ इतना ख्याल रखता हूं कि किसी नारी शक्ति की आत्मा आहत ना हो सिर्फ इतना ही मेरे दिल और दिमाग में पैमाना रहता है।

बात सिर्फ यह कहनी थी कि आप सभी का बहुत प्रेम स्नेह मिलता जैसे ही आपका एक लाईक आता है मेरा मन प्रफुल्लित हो जाता है कि वाह शायद मैंने अच्छा लिखा और जब आपकी टिप्पणी आती है तो मैं फूलकर बादल हो जाता हूं जिससे आप सभी का मार्गदर्शन भी मिलता है।

आप सभी का यह प्रेम यह स्नेह मेरे लिये अतुलनीय है और आप सभी अपने आप में बहुत श्रेष्ठ हो जो मुझ साधारण से लडके के लिखे हुए को पसंद और टिप्पणी करते हो वरना वर्तमान परिदृश्य में एक चलन खूब है एक लडकी अपनी फोटो शेयर कर दे या फिर किसी बड़े ओहदेदार प्रतिष्ठित व्यक्ति के द्वारा कुछ भी टूटा फूटा लिखा हो लाईक कमेन्ट की भरमार हो जायेगी लेकिन वहां पर स्वार्थ रहता है "शायद ध्यान दे दे"।

परंतु यहां मैं नहीं आप श्रेष्ठ हो मैं तो सिर्फ सीख रहा हूं और आप सभी के प्रेम स्नेह से जीवन आनंदमयी होता जा रहा है आपके द्वारा की हुई लाईक कमेन्ट मेरे जीवन के लिये जीवनदीप वा मार्गदर्शन हैं।

बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

मित्रों 1880 में अल्तामिरा कि गुफायें खोजी गयीं लेकिन अगर इस घटना पर गहराई से सोचा जाये तो अपने आप में एक महत्वपूर्ण घटना था इंसान जीव वा छोटे बड़े ज्ञानी अज्ञानी सभी के महत्व को बखूबी समझा जा सकता है।

एक कुत्ता भूल से एक गुफा के भीतर गिर गया बारिस हुई कुछ गीली मिट्टी उसके ऊपर गिर गयी वह कुत्ता नीचे सरक जाता है और दलदल में फंसकर आवाज करता है।
मर्सिलानो नाम का किसान अपने कुत्ते को बाहर निकालने का प्रयास करता है तभी उसे कुछ हड्डियां दिख जाती हैं और वह इतिहास का विद्यार्थी था वह कुत्ते को निकालकर गुफा के और अंदर जाता रहा प्रतिदिन एक एक हड्डी का अध्ययन करता था एक दिन उसकी 7-8 साल की लडकी कहती है पापा मैं भी चलूंगी पिता उसे ले जाता है मर्सिलानो व्यस्त हो जाता है हड्डियों के अध्ययन मे और सर्च लाईट एकदम पास था लडकी सीलिंग की तरफ यानी कि ऊपर की ओर देखने लगी अचानक से वह बोली पापा पापा ऊपर देखो और इस प्रकार से अल्तामिरा की गुफाओं की खोज हो गयी पिताजी प्रतिदिन जाते थे लेकिन सीलिंग तरफ वह देखते तक नहीं थे वह तो हड्डियां बीनने में व्यस्त थे लेकिन 7-8 वर्ष की छोटी लडकी की वजह से कमाल हो गया विश्व की सबसे प्रसिद्ध गुफाओं की खोज हो सकी जो अपने अद्भुत वा रहस्यमयी चित्रों के लिये आज भी प्रसिद्ध है।

जीवन में होने वाली घटनायें हमें वा हमारे जीवन को कोई नया मोड देती हैं प्रत्येक घटना महत्वपूर्ण है प्रत्येक जीव का महत्व है और छोटे बड़े ज्ञानी अज्ञानी समझदार मूढ का भेद नहीं करना चाहिए सभी अपनी जगह महत्व रखते हैं अगर पिता छोटी बच्ची को छोटी समझता उसकी जिज्ञासा को मार देता तो क्या इन गुफाओं का आविष्कार हो पाता?
शायद नहीं होता क्यूंकि बड़े लोग ज्ञानी लोग एक सीमित दायरे तक ही खोज करते हैं लेकिन एक बचपन का निष्छल मन संपूर्ण ब्रह्मांड को भी खोज सकता है आप लंबाई चौडाई उम्र समझदारी में बड़े हो जाओ मन को बच्चा ही रहने दो फिर देखो ना भेदभाव रहेगा ना मानसिक अवसाद होगा हम थोड़े में खुश रहेगें ज्यादा होने का घमंड नहीं होगा।
मन तो अभी बच्चा है जी।

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

वर्तमान परिस्थितियों में मित्र एक खोज

आज मित्रता के बारे में सोच रहा हूं मित्र और मित्रता क्या है बड़ा ही कठिन विषय है बहुत ज्यादा तो नहीं लेकिन मीत अर्थात प्यारा हो इस मीत शब्द से बना 'मि'।
मित्र से इत्र का उच्चारण होता है और इत्र सदैव महकता रहत है और इत्र बंद डिब्बी में ही रहता है और मीत अर्थात प्रेम हमेशा छिपा होता है मित्र शब्द में "मीत" और "इत्र" गुप्त रूप से घुले मिले हैं।
अर्थात मित्रता में प्रेम की खुशबू होती है मित्रता अकेलेपन को दूर करती है एक मित्र से हम अपने दुख सुख को साझा करते हैं खून के रिश्तों से इतर मित्रता का सम्बंध अपने आप में अलौकिक है जिस वक्त आपका कोई नहीं होता आप दुख दर्द में होते हैं समस्याओं से घिरे होते हैं तभी एक सच्चा मित्र आपके साथ होता है वह आपकी सहायता करता है और आपके दुखों को हर लेता है बहुतों का जीवन मित्रों के सहारे चलता है।
लेकिन इस जीवन में हम अक्सर समझ नहीं पाते कोई मित्र के रूप में काफी लंबे अरसे तक पीठ में छूरा घोपता रहता है और हम में से कोई एक मित्रता निभाता रहता है यह भी मित्रता की स्वाभाविक कुर्बानी है क्यूंकि मित्र में मीत है प्रेम है और हम इंसान प्रेम में कुर्बान होते रहे हैं।

वह प्रेम ही क्या जो कुर्बानी की खुशबू से ना महके जीवन में मित्रता का यही एक सिक्के के दो पहलू हैं। आप सभी के जीवन में कोई ना कोई मित्र अहम होगा जिसके लिये आपका दिल धडकता होगा और उस मित्र का भी आपके लिये धडकता होगा आप दोनों एक दूसरे के जीवन में एक पूरक का काम करते होगें क्षमतानुसार प्रत्येक मित्र अपने मित्र की मदद करता है।
कृष्ण और सुदामा की मित्रता जग जाहिर है जब भी मित्रता की चर्चा होती है कृष्ण सुदामा का नाम अनपढ की जुबान में मूक और बधिर के हृदय में स्वयमेव समा जाता है।
जैसे जैसे समय आधुनिकता की ओर बढ रहा है वैसे वैसे मित्रता का मीत और इत्र कहीं खोता जा रहा है शायद अधिक व्यस्तता आगे बढने की प्रतिस्पर्धात्मक प्रतियोगिता या फिर इंसान के स्वभाव में कुटिलता छा जाना बहुत से मित्र ऐसे मिलते हैं जो अपने किसी मित्र की कूटनीति कुटिलता अत्यधिक चापलूसी से या तो धोखा खाये या फिर उनकी हरकत से परेशान हैं।
यह समय ऐसा है कि सबकुछ सोच समझकर करने योग्य है लेकिन मित्रता के प्रेम में अंधे हो जाते हैं।
मैं अपने बारे में बताऊं तो मेरे कुछ बचपन के मित्र आज भी उसी सहज भाव से मेरे साथ हैं गरीब अमीर सभी से उतना ही स्नेह प्रेम अनवरत बना हुआ है जब भी मिलते हैं अत्यंत खुश होते हैं कितनी भी दूर रहें संचार माध्यम से बात होती ही रहती है और फिर व्यावसायिक मित्र राजनीतिक मित्र आभासी दुनिया के मित्र सभी से सहज संबंध लेकिन एक मित्र जीवन में ऐसा भी है जिसने बार बार दर्द दिया और हम निभाते चले गये_______


बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

कांग्रेस वा धर्मनिरपेक्ष ताकतों में नेतृत्व क्षमता की कमी है

मान ना मान मैं तेरा मेहमान की तर्ज पर नरेन्द्र मोदी जी कम से कम १० वर्ष कांग्रेसी बसपाई सपाई संपूर्ण धर्मनिरपेक्ष साथियों के प्रधानमंत्री अनवरत बने रहेंगे यह कोई भविष्यवाणी नहीं बल्कि मेरा आत्मविश्वास कहता है।

नरेन्द्र मोदी जैसा नेतृत्व कम से कम वर्तमान समय में भारत के किसी भी नेता में नहीं है और धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाले ताकतों की एक आंख राहुल गांधी में नेतृत्व क्षमता की कमजोरी है वह मोदी के आसपास नहीं टिकते।
तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों के पास अभी लगभग चार वर्ष ६ महीने हैं ढूंढों खोजो सीखो सिखाओ एकदम दमदार नेता निकाल के लाओ टेस्ट ट्यूब से तो अगले चुनाव में मदारी का खेल देखने में ज्यादा आनंद आयेगा लेकिन जीत तो भारत मां के सपूत नरेन्द्र मोदी की ही होगी।
मोदी जी में गजब की कार्यक्षमता वा नेतृत्व क्षमता है।
अब किसी को इतना वक्त और मौका नहीं कि वह अप्रवासी भारतीयों का दिल जीत सके और मोदी जी ने बाजी मार ली।
खैर ५०० करोड वाले व्हील चमक वाले राहुल जी विदेश तो हमेशा जाते हैं पर वह अपने गुप्त कार्यों में ही व्यस्त रहते हैं कभी इतनी दूरदृष्टि नहीं रही कि अप्रवासी भारतीयों से बैठकर चर्चा करते उनके हालचाल लेते उनकी समस्याओं से रूबरू होते तो शायद वह भारत आकर उनका प्रचार करते और कभी तो बाजी मार लेते।
लेकिन राहुल जी विदेश छुट्टियां मनाने जाते हैं और मोदी जी काम करने जाते हैं यह फर्क है।
जहां राहुल विदेश में गुपचुप तरीके से रहते हैं वही मोदी खुल्लमखुल्ला रहते हैं।
वैसे वैश्विक इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी भारतीय नेता को इतनी ज्यादा तादाद में अप्रवासी भारतीय और विभिन्न देशों की जनता ने एक साथ सुना हो लेकिन फिर भी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सर्वगुण संपन्न ताकतें अपने ही राष्ट्र के प्रधानमंत्री पर कमियां निकालने में व्यस्त हैं राजदीप जैसे इटली बेस्ड पत्रकार जब अमेरिका में राष्ट्रद्रोह जैसा कार्य कर रहे थे तो देशभक्त अप्रवासी भारतीयों ने उन्हें यह बता दिया कि यह अमेरिका है और हम जागरूक भारतीय हैं।
मुझे मोदी जी भाषण सुनकर आभाष हो गया है कि अभी तक तो ऐसे किसी का जन्म नहीं हुआ जो मोदी की जगह ले सके परंतु टेस्ट ट्यूब एक विकल्प है और कुछ हाईट वर्धक और बुद्धिवर्धक शंखपुष्पी प्रकार की आदि दवाईयों का प्रयोग करें तो शायद अगला चुनाव देखने योग्य हो वरना चुनाव एकतरफा मोदी ही जीतेगें।
#कोई_शक?

बुधवार, 24 सितंबर 2014

अकर्मण्य सांसद और राम भरोसे हिंदुस्तान

मित्रों एक समय था जब हम मोदी जी को प्रधानमंत्री बनाने के लिये सोशल मीडिया वा जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे थे मैंने तो पुणे से नौकरी भी छोड दी थी और भी कुछ व्यक्तिगत कारण थे परंतु मोदी मिशन भी दिल दिमाग में था।
               सिर्फ मेरी ही नहीं राष्ट्र के प्रत्येक नवयुवक की यही इच्छा थी और जब मन से ठाना था तो सभी ने त्याग किया यह बीजेपी की जीत कम कांग्रेस के भ्रष्टाचार कुशासन के विरूद्ध जनता वा राष्ट्रवादी नवयुवकों की जीत थी जो विकास और रोजगार चाहते थे इसी उम्मीद के साथ उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश ने मोदी जी को हांथों हाथ लिया बल्कि कहूं तो अपनी गोद में बिठाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दिया।
               अब समस्या यह सामने आ रही है कि ज्यादातर समर्थक इतने कम दिनों में ही संपूर्ण विकास चाहते हैं जो जहां से वह वहीं विकास चाहता है जो जिस मुहल्ले से है उस मुहल्ले में सडक चाहता है बिजली चाहता है पानी चाहता है रोजगार चाहता है उनकी सोच गलत भी नहीं है अगर ऐसा हो जाये तो "सोने पे सुहागा" होगा।
          लेकिन जिस कांग्रेस और धर्मनिरपेक्ष ताकतों के शासन के द्वारा हमारा आज तक यह स्वप्न पूर्ण नहीं हुआ तो क्या इन तीन महीनों में ही हमारा स्वप्न साकार हो जायेगा क्या हो जाना चाहिए।
           हम सभी शिक्षित हैं हमें ज्ञात है कि हमारा राष्ट्र लोकतांत्रिक गणराज्य है और प्रादेशिक शासन तथा केंद्रीय शासन में विभक्त है। राष्ट्र के लिये जितनी ज्यादा जिम्मेदार केन्द्र सरकार होती है एक प्रदेश के लिये उतनी ही जिम्मेदार वा ताकतवर प्रादेशिक सरकार होती है।
केन्द्र सरकार के साथ साथ कदम से कदम मिलाकर गरीबी हटाओ विकास पाओ रोजगार दो जैसे उद्देश्य की प्राप्ति प्रादेशिक सरकारें कर सकती हैं और व्यवस्था का एक जाल विछा है जिला तहसील ब्लाक ग्रामसभा स्तर तक सबको जिम्मेदारी निभानी होगी।
अगर मैं वर्तमान हालातों पर नजर डालूं चिंतन करूं तो ऐसा लग रहा है कि भारत को विश्व विजेता बनाने के लिये सचिन और सहवाग की जोडी ओपनिंग बैटिंग अच्छी कर रही है राष्ट्र के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार मेहनत कर रहे हैं वो जापान गये तो कुछ लेकर आये हिन्दी में बोलकर राष्ट्र वा मातृभाषा का गौरव बढाया।
           पाकिस्तान से लगातार कड़े तेवर बनाये रखे और आज अगर वो युद्ध भी कर ले तो विपक्ष और एक बहुतायत जनता ही उनके निर्णय को गलत करार देने लगेगी क्यूंकि युद्ध हमें विकास के मामले में १० वर्ष पीछे ले जा सकता है इसलिए पाक को उसी की भाषा में कूटनीतिक जवाब दिया तो स्थितियां जल्द ही काबू में दिखेगी और जरूरत पडने पर हमारी सेना सदैव तैयार है।
नरेन्द्र मोदी जी की अमेरिका की यात्रा एक बडा संदेश देगी इसके बाद आप सभी को काफी कुछ स्पष्ट नजर आने लगेगा कि हमारा देश किस ओर जा रहा है।
इतने कम समय में बड़े फैसले लिये हैं राम सेतु का ना तोड़ा जाना हिन्दू संस्कृति की रक्षा हेतु अविस्मरणीय कदम है।
बात रही राम मंदिर की तो मामला कोर्ट में विचाराधीन है और राष्ट्र के प्रधानमंत्री का धर्म बनता है कि वह न्यायपालिका के निर्णय का इंतजार करें और वह सपथ भी लेते हैं पद और गोपनीयता की मुझे विश्वास है इस मुद्दे पर भी आप जल्द ही संतुष्ट नजर आयेगें।
     धारा ३७० हटाने के लिये लोकसभा सहित राज्यसभा में भी बहुमत होना चाहिए जो उचित समय पर ही हो सकता है तो जरा धैर्य और इंतजार का मजा लीजिए। आपके शरीर ५० साल का नासूर हो और वह १० दिन की दवा लेकर ठीक हो सकता है क्या ?
कामन सिविल कोड गौ हत्या सब मुद्दे में समय तो लगेगा एक घर की रसोईं चलाने की कठिनाई कोई गृहणी ही बता सकती है यहां तो संपूर्ण राष्ट्र की रसोईं का एक ही मालिक रसोईंयां नरेन्द्र मोदी ही नजर आ रहे हैं क्यूंकि उनके बहुतेरे सांसद खुद जीतकर नहीं आये उन्हें मोदीजीत मिली है इसलिए मोदी जी की मेहनत पर अगर कोई पानी फेर रहा है तो वह कोई और नहीं उनके संसद सदस्य ही अकर्मण्यता वा दलालों के शिकार हो रहे हैं वो सांसद निधि कब कहां कितनी किस विकास कार्य हेतु खर्च करेंगे आज तक कोई जनता के सामने अपनी बात नहीं रख रहे हैं जब वह चुनाव लडते थे तो बोलते थे कि मोदी जी ने कहा है पूरे संसदीय क्षेत्र के आसपास के क्षेत्र में फैक्ट्रियां होगी सबको रोजगार मिलेगा विकास होगा लेकिन जीतने के बाद बहुत से सांसदों ने जनता और समर्थकों को मुंह नहीं दिखाया और सीधे मुह बात नहीं की वो सिर्फ बड़े दलालों को कुर्सी देते हैं और कमीशनबाज़ी की रमझगरी में व्यस्त रहते हुए घूमते फिरते कभी कभी राजनैतिक स्टंट दिखा देते हैं जिससे अगले दिन अखबार के माध्यम से जनता को मालूम हो जाता है कि सांसद जी जिंदा हैं।
जय हिंद #राम_भरोसे_हिंदुस्तान

रविवार, 3 अगस्त 2014

मेरे बचपन के अनछुये पल

मित्रों पिछले कुछ दिनों से ही अक्सर मेरा मन उदास हो जाता है। मुझे कुछ बचपन की बातें घटनाएं याद आ गई आज मैं ये सब इसलिए नहीं लिखने जा रहा हूं कि मैं आपको अपनी उन बातों को सिर्फ बताना चाहता हूं नहीं बिलकुल नहीं बल्कि उन एहसासों से सबको सीख मिले चाहे वो गुरू जी हों या शिशु विद्या मंदिर का विद्यार्थी। मित्रों बात उन दिनों की है जब मैं बचपन में अपने ही कस्बे के विद्या मंदिर का विद्यार्थी हुआ करता था। वीणावादिनी मां सरस्वती के आशीर्वाद मैं भी पढने में अव्वल था और ऐसी ही कुछ मां की कृपा मेरी ही सहपाठनी को प्राप्त थी। हम दोनों की प्रतिस्पर्धा रहती थी कौन कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करेगा और अक्सर हम दोनों ४-१० नंबर के अंतर से प्रथम द्वितीय आते रहते थे। एक बार गणित के पेपर में एक सवाल छूट गया था तब वो त्रैमासिक परीक्षा थी मैं बहुत रो रहा था क्यूंकि मुझे दुख हो रहा था कि मैं अब पीछे हो जाऊंगा। उसकी छोटी बहन भी उसी स्कूल में पढती थी जासूस नं.१ और उसनें अपनी जासूसी के तहत मुझे रोते हुए देख लिया और एक कदम भी ना रूककर किंगफिशर एयरलाइन्स की तेज रफ्तार से वह अपनी बड़ी बहन यानी कि मेरी प्रतिस्पर्धी सहपाठिनी को बता ही दिया दीदी दीदी सौरभ कक्षा में बैठ के अकेले में रो रहा है तभी मेरी सहपाठिनी का उसी कक्षा में प्रवेश होता है और वो बोलती हैं क्यूं रो रहे हो मत रोओ मेरा भी अंग्रेज़ी का पेपर बिगड गया है २ प्रश्न छूट गये हैं तुम चिंता मत करो तुम इस बार आगे रहोगे। ऐसे बोली जैसे मेरे बिन बोले मेरे मन की बात पढ ली थी लेकिन साथ ही मेरी सहपाठिनी का घमंड भी बोल गया था उसने कहा लेकिन तुम्हें चुनौती देती हूं अर्द्धवार्षिक परीक्षा में अगर तुम आगे हो गये तो मैं स्कूल छोड दूंगी। मैं एकदम चुप आखिर मैं क्यूं चाहूंगा वो स्कूल छोड थे एक वो भी तो थी जिसकी वजह से पढना भी रूचिकर था। मैंने वो चुनौती स्वीकार कर ली मन ही मन सोचता था इसे स्कूल नहीं छोडने दूंगा और एक दिन उसकी अनुपस्थिति में एक अध्यापक थे उनसे बातें होने लगी इसी संबंध में तो उन्होंने कहा सौरभ मेहनत कितनी भी करनी पड जाये तुम्हें इस लडकी का घमंड तोडना है मैंने भी सोचा जंग में कभी भावनाओं में नहीं बहा करते और अपनी सर्वोत्कृष्ट तैयारी शुरू कर दी। अर्द्धवार्षिक परीक्षा हुई और एकदिन अंतिम परिणाम घोषित हो गया और ईश्वरीय कृपा से मैं कक्षा में ही नहीं स्कूल टाप कर दिया उस वक्त पूरे स्कूल में सबसे ज्यादा मेरे नंबर आये। लेकिन मैंने अपनी सहपाठिनी को स्कूल नहीं छोडने दिया और वो भी स्कूल छोड के नहीं जा सकती थी एक नहीं सौ बार हार जाये इस प्रकार से हम अच्छे पडोसी और अच्छे दोस्त भी थे और अच्छे सहपाठी। अब ये इत्तेफाक ही था कि बचपन से ही चुनाव लडने का भूत सवार था स्कूल में ही कक्षा पांच से ३ बार सेनापति रहा एक बार निर्विरोध और एक बार मेरा ही हमदर्द मेरे सामने था लेकिन फिर भी पूरे स्कूल की बहुतायत छात्र छात्राओं ने मुझे ही पसंद किया था और भारी अंतर से चुनाव जीता भी था बस एक बार कक्षा ८ में एक चुनाव हारा था जबकि मुझे मेरे शुभचिंतक गुरूजी ने सुझाव दिया था कि तुम अध्यक्ष का चुनाव लडो तो मैंने बोल दिया मेरी वर्दी रखी है वो बेकार हो जायेगी और उस समय मैं कुछ मतों के अंतराल से अपने ही दोस्तों कि जलन से वो चुनाव हार गया पहली बार हार का सामना किया था वो कोई और नहीं Pawan Tiwari जी हैं जो मुझसे एक कक्षा पीछे थे लेकिन फिर भी सीनियर स्टूडेंट होने की वजह से मुझे सम्मान मिला प्रार्थना सभा स्थल पर पहले की तरह मैं ही नेतृत्व करता रहा और मेरी सहपाठिनी और इसी कारण हम प्रार्थना खत्म होते ही जल्द ही कक्षा में पहुंच जाते थे और हमारी बातें शुरू हो जाती थी और हमारे अध्यापक को गलतफहमी हुई वो मुझसे बोलने लगे तुम ईधर से नहीं ईधर से जाओगे सबके साथ मैं बचपन से ही कुछ ऐसा ही था मैंने उनसे पूंछ ही लिया इधर से जाने में और उधर से जाने में क्या अंतर है? उन्होंने जवाब दिया वो तुम जानते हो और मैं जानता हूं तो मैंने भी कह दिया जो आप जानते हो और मैं जानता हूं वो सभी जान जायें और वो अपने कार्यालय मैं अपनी कक्षा में मुझे मारने आ रहे थे परंतु अध्यापकों ने रोक दिया। जब कर नहीं तो डर किस बात का। कुछ समय पश्चात नया वर्ष था वो समय मैसेज फेसबुक इंटरनेट मोबाइल का था ही नहीं लैंडलाइन हम दोनों के घर में जरूर था और ग्रीटिंग्स का जमाना था। उसी समय हमारी लडाई भी हुई थी तब मेरा अनुमान और लैंडलाइन का कमाल काम आया था मैंने नंबर डायल किया घंटी बजी और मेरे अनुमान के अनुसार मेरी सहपाठिनी ने ही फोन उठा लिया शिवाय उसका नाम लेने के मैं कुछ बोल ना सका और रिसीवर वापस पटक दिया और फोन कट गया अगली सुबह हम दोस्त हो गये फिर से। अब नया वर्ष नजदीक था मैं ढेर सारे ग्रीटिंग्स लाया था उनमें से एक ग्रीटिंग बहुत ही खूबसूरत थी तभी मेरी बहन ने बोला लाओ ये ग्रीटिंग मुझे दे दो मैं दे देती हूं यानी कि मेरी सहपाठिनी को मैं कब मना करने वाला था उसके बताये अनुसार अपनी लेखनी में उसके नाम से ग्रीटिंग लिख दिया मैने। मुझे एहसास भी नहीं था आगे क्या होगा। मेरी बहन के द्वारा ग्रीटिंग मेरी सहपाठिनी के हांथ में पहुंच गया और उसने स्कूल से लौटते हुए रास्ते में ही ग्रीटिंग को लिफाफे से आजाद कर दिया लिफाफा फाड के। जैसे ही उसने ग्रीटिंग देखा तो मेरी लेखनी पहचान गई और उसने अपनी सहेली से सहज भाव से ही कह दिया कि ये सौरभ का लिखा हुआ है और इत्तेफाक से मेरे एक अध्यापक की पारिवारिक मेरी ही छोटी बहन उसके पीछे थी उसके कानों में सच सुनाई दिया था कि ग्रीटिंग सौरभ का लिखा हुआ है और उसने अपने चाचा जी को बोल ही दिया जो कि अध्यापक थे कि सौरभ ने ग्रीटिंग दिया है हाय तौब मच गई मेरी सहपाठिनी ईधर ऊधर फर्राटे मारते हुए बिन चेतक के तेज रफ्तार में ईधर उधर दौड रही थी गुस्से से लालपीली मैं आराम से बैठा था देख तमाशा लकड़ी का" मैं भी सोच रहा था क्या बात है और तभी मुझे मेरे अध्यापक का बुलावा फील्ड के लिये आ ही गया मैं निडर था और पहुंच गया उन्होंने बोला तुमने ग्रीटिंग दिया है मैे बोला मैंने नही दिया इस प्रकार से फील्ड के चक्कर पूरे होने को आ गये उनकी हां और मेरी ना में तभी गिरी हुई चाल का गिरा हुआ मोहरा सामने आता है गवाह के रूप में कि एक बार मैं उससे बोल रहा था ग्रीटिंग देने के लिये। हा हा हा हा हा हा अब ऐसा क्यूं किया था पता नही पर मुझे बोले चलो कार्यालय में मुर्गा बन जाओ मैंने साफ बोला आज तक ठीक से दो छड़ी मार तो खाई नहीं अगर कभी मौका भी आया था तो हल्के हांथों से मार के रफा दफा कर देते थे तो मैं मुर्गा नहीं बन सकता और मेरी गलती भी नहीं है मैं कक्षा में गया अपना बैग उठाया और उन्हें साफ बोल दिया मेरा नाम काट दीजिए मैं घर जा रहा हूं और मैं सीधा घर आ गया था। शायद मेरे जैसे बहुत से विद्यार्थी होगें। ये है मेरे बचपन के कुछ पल।
#बस_इत्ती_सी_बात

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

मेरी मातृभाषा और उपेक्षा


मैं हिंदी हूं हिंदुस्तान की मातृभाषा जो शहर से लेके गांव गली मुहल्ले तक जन जन में फैली हुई है जन्म लेने वाला नवजात शिशु अपनी जुबान से पहला शब्द हिंदी का ही निकालता है "मां" लेकिन आज तक मुझे न्याय नहीं मिला मैं सरकारी कार्यों में उपेक्षा का शिकार हो रही हूं। परीक्षाओं में मेरी जगह अंग्रेजी भाषा को स्थान दिया जा रहा है। अंग्रेजी माध्यम स्कूल खुल रहे हैं। समस्या यहां तक है कि इस देश की बहुतायत जनता को अंग्रेजी नहीं आती परंतु कोर्ट का आर्डर(आदेश) अंग्रेजी में ही आता है जिससे अभियुक्त उसका अर्थ ही नहीं समझ पाता वही किसी ज्यादा पढे लिखे वकील के सहारे रह जाते हैं। अपने ही देश में विदेशी भाषा का ज्ञान न होने पर हमें हेय दृष्टि से देखा जाता है या हमें शर्मिंदगी महसूस करनी पडती है मैं कैसा हिंदुस्तानी हूं ये कैसा हिंदुस्तान है जहां हमारी ही मातृभाषा के आत्मसम्मान का चीरहरण हो रहा हो और हम सभी भारतीय तमासबीन बनकर देख रहे हैं। क्या हमारा यही कसूर है कि हमारा जन्म ब्रिटेन में होना चाहिए या हमें बचपन से ही अंग्रेजी पढना चाहिए बस और अगर हम पिछड़े क्षेत्र से हैं किसी कारणवश अंग्रेजी नहीं पढ पाये तो इसके लिये इतनी बड़ी सजा मिलेगी कि हम अपने ही राष्ट्र में अच्छी नौकरी नहीं कर सकते। चीन से लेकर ब्रिटेन जापान ये जो भी विकसित राष्ट्र हैं इन्होनें सर्वप्रथम अपनी मातृभाषा को सम्मान दिया और बहुतायत कार्य उनकी अपनी मातृभाषा में ही संपन्न होते हैं और यही राष्ट्र का गौरव है यही विकास का प्रमाण है। हमारी मातृभाषा को उचित सम्मान मिले भारत माता के लाल का बलिदान बेकार नहीं जाना चाहिए। हमें हिंदी चाहिए हमारी मातृभाषा चाहिए आज आजादी के इतने वर्षों में आजतक हमारी मातृभाषा राष्ट्र भाषा नहीं बन सकी आखिर क्यूं ये सवाल मेरे मन में जन्म लेता है?

गुरुवार, 31 जुलाई 2014

धार्मिक और सामाजिक विवाह और कत्ल। ये दांस्ता है कानपुर महानगर के एक कारोबारी परिवार की जहां धन की कमी नहीं थी परंतु विवेक और आपसी समझ की कमी जरूर रही होगी। माता पिता बच्चों को जन्म देते हैं और उनकी परवरिश करते हैं और एक उम्र तक आते आते वो अपने बच्चे को बड़ा व समझदार समझने लगते हैं और जिस प्रकार से बुढ़ापे में आंखों की रोशनी कमजोर होने लगती वैसे ही बच्चों की बढती उम्र से माता पिता उन्हें समझदार मानकर अपनी नजरें हटा लेते हैं जबकि इसी बढती उम्र के साथ ही बच्चों को माता पिता के सहयोग व भावनात्मक मार्गदर्शन की सदैव आवश्यकता रहती है वरन् नवयुवकों को भटकते देर नहीं लगती यह तरूणावस्था की उम्र बचपन की अपेक्षा ज्यादा खतरनाक हो सकती है और इसके बहुत से उदाहरण मिल जायेगें जब इस उम्र में बहुत से नवयुवक अपने जीवन का रास्ता भटक गये। हमारी भारतीय संस्कृति मे विवाह जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक वा धार्मिक बंधन है सभी धर्मों की अलग अलग परंपरायें हैं उनमें से एक धर्म हिंदू धर्म है हम विभिन्न धार्मिक परंपराओं के साथ साथ अग्नि के सात फेरे सात जन्मों हेतु लेते हैं और ढेरों वैदिक धार्मिक मंत्रोच्चार के साथ अग्नि के सात फेरे पूरे होते ही हमारे विवाह को सामाजिक मान्यता मिल जाती है लेकिन तथ्यात्मक व रहस्यात्मक बात यह है कि इन सात फेरों के साथ सात जन्मों के लिये सातो(७+७=१४) दिल मिले या नहीं? हमारे विचार मिले या नहीं हम भावनात्मक रूप से जुड पाये या नहीं इस पर कभी कोई विचार नहीं होता। शादी जीवन में परिवर्तन लाती है वैवाहिक जीवन में प्रवेश कराने से पहले क्या माता पिता परिवार रिश्तेदारों को आवश्यकता नहीं कि जिसकी हम शादी करने जा रहे हैं वो दिमागी रूप से हृदय से क्या तैयार है जिससे हम इसे जोडने जा रहे हैं क्या इन दोनों के विचार मिलते हैं क्या ये दोनों एक दूसरे को स्वरूपात्मक व भावनात्मक रूप से पसंद करते हैं या नहीं क्या ये दोनों मरते दम तक साथ रह सकते हैं? हमारे समाज में ऐसी मान्यता नहीं है हालांकि काफी परिवर्तन आया है परंतु उस परिवर्तन में भी अभी कमी है। हमारे समाज में नवयुवक एक तय उम्र तक पहुंचा नहीं कि उसके माता पिता उसे धंधे रोजगार में लगाने से पहले ही उसके परिपक्व होने से पहले ही उसे वैवाहिक बंधन में बांधने को तैयार हो जाते हैं और उस विवाह को पारिवारिक वा सामाजिक इज्जत से जोडते हैं "#दिल_मिले_ना_मिले_जाति_धर्म_मिलना_आवश्यक_है। बांकी काम पंडित जी पूरा कर देते हैं पत्रा में देख के गुण मिला देते हैं और आजतक पंडित जी के द्वारा मिलाये हुए गुणों की शादी जी बहुत कम जाती है बल्कि काटी ज्यादा जाती है और ऐसा नहीं है कि प्रेम विवाह में समस्यायें नहीं आती वहां भी समस्यायें आ सकती है और आती है पर अपनी पसंद से शादी करने का संतोष रहता होगा और संतोष रहना चाहिए और उस प्रेम विवाह में कभी तो हम प्रेम में जीते ही हैं भले कुल पल जियें पर प्रेमरूपी संतोष हो जाता है परंतु घर परिवार की पसंद से की गई शादी में शायद ही पल भर के प्रेम में हम जी पाते हो। दो शरीरों का मिलन दो आत्माओं का मिलन यूं ही नहीं होता हमें पूरे वैवाहिक परंपराओं पर विचार करने की आवश्यकता है कम से कम एक नहीं सौ बार लडका लडकी से पूंछने की आवश्यकता है कि तुम ये वैवाहिक जीवन जीने को तैयार हो या नहीं? जबतक प्रत्युत्तर में कडाकेदार "हां" न मिल जाये तब शादी को इज्जत के नाम पर जोडकर तैयार नहीं होना चाहिए नहीं तो उसके परिणाम उल्टे हो सकते हैं आपका बेटा बेटी अवसादग्रस्त हो सकते हैं वो अपने मार्ग को भटक सकते हैं। पीयूष जन्म से अपराधी नहीं था पीयूष विवाह के पूर्व भी अपराधी नहीं था परंतु पीयूष विवाह के उपरांत अपराधी हो गया वो भी किसी और का नहीं अपनी सात फेरों वाली सात जन्मों की जीवन संगिनी का अपराधी हो गया और सात जन्मों की बात छोडिए इसी जन्म में विछड गये उसकी जीवन संगिनी इस संसार से मुक्त हो गयी और जीवनसाथी कारागृह में सलाखों के पीछे पहुंच गया। पीयूष ऐयास था ये कहूं या पीयूष ऐयास हो गया ये कहूं उसकी जीवनसंगिनी भी बला की खूबसूरत थी मुझे तो शालीन भी दिख रही थी उसकी आंखों में ईमानदारी साफ झलक रही थी फिर भी पीयूष ने उस मासूम का कत्ल कर दिया पता नहीं क्यूं आखिर क्यूं? शायद पीयूष अभी तक परिपक्व नहीं था बड़े रहीश खानदान का था तो ऐयाशी के ऐसे मार्ग पर भटका कि अपनी पत्नी का कत्ल करा दिया ये किसी और के प्रति प्यार है या हवस है लेकिन इस समस्या का हल मौत नहीं थी परंतु ये विवाह अंत में मौत और मातम का रूप धारण कर लेगा किसी ने सोचा नहीं रहा होगा कि हम अपने बेटे की शादी नहीं सलाखों के पीछे भेजने का काम कर रहे हैं और हम अपनी बेटी की शादी नहीं मौत दे रहे हैं ये दोनों एक दूसरे के जीवनसाथी नहीं अपराधी हैं कोई कल्पना नहीं कर सकता और ऐसी बहुत सी शादियां टूटती हैं या शादियां जी नहीं जाती बल्कि इंसान जीवन काटता है समाज को पुनर्विचार करने की आवश्यकता है अगर आपको अपने बेटे को पीयूष और बेटी को ज्योति नहीं बनाना ??????????????????????

धार्मिक और सामाजिक विवाह और कत्ल। ये दांस्ता है कानपुर महानगर के एक कारोबारी परिवार की जहां धन की कमी नहीं थी परंतु विवेक और आपसी समझ की कमी जरूर रही होगी। माता पिता बच्चों को जन्म देते हैं और उनकी परवरिश करते हैं और एक उम्र तक आते आते वो अपने बच्चे को बड़ा व समझदार समझने लगते हैं और जिस प्रकार से बुढ़ापे में आंखों की रोशनी कमजोर होने लगती वैसे ही बच्चों की बढती उम्र से माता पिता उन्हें समझदार मानकर अपनी नजरें हटा लेते हैं जबकि इसी बढती उम्र के साथ ही बच्चों को माता पिता के सहयोग व भावनात्मक मार्गदर्शन की सदैव आवश्यकता रहती है वरन् नवयुवकों को भटकते देर नहीं लगती यह तरूणावस्था की उम्र बचपन की अपेक्षा ज्यादा खतरनाक हो सकती है और इसके बहुत से उदाहरण मिल जायेगें जब इस उम्र में बहुत से नवयुवक अपने जीवन का रास्ता भटक गये। हमारी भारतीय संस्कृति मे विवाह जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक वा धार्मिक बंधन है सभी धर्मों की अलग अलग परंपरायें हैं उनमें से एक धर्म हिंदू धर्म है हम विभिन्न धार्मिक परंपराओं के साथ साथ अग्नि के सात फेरे सात जन्मों हेतु लेते हैं और ढेरों वैदिक धार्मिक मंत्रोच्चार के साथ अग्नि के सात फेरे पूरे होते ही हमारे विवाह को सामाजिक मान्यता मिल जाती है लेकिन तथ्यात्मक व रहस्यात्मक बात यह है कि इन सात फेरों के साथ सात जन्मों के लिये सातो(७+७=१४) दिल मिले या नहीं? हमारे विचार मिले या नहीं हम भावनात्मक रूप से जुड पाये या नहीं इस पर कभी कोई विचार नहीं होता। शादी जीवन में परिवर्तन लाती है वैवाहिक जीवन में प्रवेश कराने से पहले क्या माता पिता परिवार रिश्तेदारों को आवश्यकता नहीं कि जिसकी हम शादी करने जा रहे हैं वो दिमागी रूप से हृदय से क्या तैयार है जिससे हम इसे जोडने जा रहे हैं क्या इन दोनों के विचार मिलते हैं क्या ये दोनों एक दूसरे को स्वरूपात्मक व भावनात्मक रूप से पसंद करते हैं या नहीं क्या ये दोनों मरते दम तक साथ रह सकते हैं? हमारे समाज में ऐसी मान्यता नहीं है हालांकि काफी परिवर्तन आया है परंतु उस परिवर्तन में भी अभी कमी है। हमारे समाज में नवयुवक एक तय उम्र तक पहुंचा नहीं कि उसके माता पिता उसे धंधे रोजगार में लगाने से पहले ही उसके परिपक्व होने से पहले ही उसे वैवाहिक बंधन में बांधने को तैयार हो जाते हैं और उस विवाह को पारिवारिक वा सामाजिक इज्जत से जोडते हैं "#दिल_मिले_ना_मिले_जाति_धर्म_मिलना_आवश्यक_है। बांकी काम पंडित जी पूरा कर देते हैं पत्रा में देख के गुण मिला देते हैं और आजतक पंडित जी के द्वारा मिलाये हुए गुणों की शादी जी बहुत कम जाती है बल्कि काटी ज्यादा जाती है और ऐसा नहीं है कि प्रेम विवाह में समस्यायें नहीं आती वहां भी समस्यायें आ सकती है और आती है पर अपनी पसंद से शादी करने का संतोष रहता होगा और संतोष रहना चाहिए  और उस प्रेम विवाह में कभी तो हम प्रेम में जीते ही हैं भले कुल पल जियें पर प्रेमरूपी संतोष हो जाता है परंतु घर परिवार की पसंद से की गई शादी में शायद ही पल भर के प्रेम में हम जी पाते हो। दो शरीरों का मिलन दो आत्माओं का मिलन यूं ही नहीं होता हमें पूरे वैवाहिक परंपराओं पर विचार करने की आवश्यकता है कम से कम एक नहीं सौ बार लडका लडकी से पूंछने की आवश्यकता है कि तुम ये वैवाहिक जीवन जीने को तैयार हो या नहीं? जबतक प्रत्युत्तर में कडाकेदार "हां" न मिल जाये तब शादी को इज्जत के नाम पर जोडकर तैयार नहीं होना चाहिए नहीं तो उसके परिणाम उल्टे हो सकते हैं आपका बेटा बेटी अवसादग्रस्त हो सकते हैं वो अपने मार्ग को भटक सकते हैं। पीयूष जन्म से अपराधी नहीं था पीयूष विवाह के पूर्व भी अपराधी नहीं था परंतु पीयूष विवाह के उपरांत अपराधी हो गया वो भी किसी और का नहीं अपनी सात फेरों वाली सात जन्मों की जीवन संगिनी का अपराधी हो गया और सात जन्मों की बात छोडिए इसी जन्म में विछड गये उसकी जीवन संगिनी इस संसार से मुक्त हो गयी और जीवनसाथी कारागृह में सलाखों के पीछे पहुंच गया। पीयूष ऐयास था ये कहूं या पीयूष ऐयास हो गया ये कहूं उसकी जीवनसंगिनी भी बला की खूबसूरत थी मुझे तो शालीन भी दिख रही थी उसकी आंखों में ईमानदारी साफ झलक रही थी फिर भी पीयूष ने उस मासूम का कत्ल कर दिया पता नहीं क्यूं आखिर क्यूं? शायद पीयूष अभी तक परिपक्व नहीं था बड़े रहीश खानदान का था तो ऐयाशी के ऐसे मार्ग पर भटका कि अपनी पत्नी का कत्ल करा दिया ये किसी और के प्रति प्यार है या हवस है लेकिन इस समस्या का हल मौत नहीं थी परंतु ये विवाह अंत में मौत और मातम का रूप धारण कर लेगा किसी ने सोचा नहीं रहा होगा कि हम अपने बेटे की शादी नहीं सलाखों के पीछे भेजने का काम कर रहे हैं और हम अपनी बेटी की शादी नहीं मौत दे रहे हैं ये दोनों एक दूसरे के जीवनसाथी नहीं अपराधी हैं कोई कल्पना नहीं कर सकता और ऐसी बहुत सी शादियां टूटती हैं या शादियां जी नहीं जाती बल्कि इंसान जीवन काटता है समाज को पुनर्विचार करने की आवश्यकता है अगर आपको अपने बेटे को पीयूष और बेटी को ज्योति नहीं बनाना ??????????????????????

मेरी मातृभाषा


मैं हिंदुस्तानी हू मेरी मां हिंदुस्तानी है मेरा जन्म हिंदुस्तानी मां की गर्भ से हुआ है मेरी जुबान पर आने वाली पहली भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम मेरी मातृभाषा हिंदी है और मैं अंग्रेजी में होने वाले हर एक कार्य का विरोध करता हूं अंग्रेजी वो भाषा है जो हमारे लिये धोखा है धोखे से बढकर कुछ नहीं। मेरी मां ने मुझे हिंदी सिखायी है तो मैं हिंदी ही बोलूंगा हिंदी ही लिखूंगा और यही मेरा अभिव्यक्ति का माध्यम है मैं उस अंग्रेजी मानसिकता की गुलाम सरकार व कार्यों का विरोध करता हूं ये हमारे साथ धोखा है एक मीठा जहर जिसे मैं पीने से इंकार करता हूं मुझे गर्व है कि मैं हिंदी भाषी हूं और इस क्रांति में सहभागी हूं मैं अपने भाईयों के साथ हूं जिनकी जान गई है उन्हें शहीद का दर्जा मिले सरकार को जल्द से जल्द विचार करना चाहिए ये हमारी मातृभाषा और हमारी भारतीयता का अपमान है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
#क्रांति

                                            कहना तो बहुत कुछ.................पर 

अपनी गलती, गलती होती है और दूसरे की गलती अपराध होती है। ये विचार मेरे मन में इसलिये जन्म लिये कि जब मैं मेट्रो में यात्रा कर रहा था तभी खचाखच भरे कोच में एक आधुनिक परिधान पहने हुए २१वीं सदी की लडकी भी यात्रा करने के लिये प्रवेश करती है। अब चूंकी ये ट्रेन है तो अमीर गरीब सभी यात्रा करते हैं साफ सुथरे कपड़े वाले भी और जिनके पास कपड़े साफ करने के लिये पैसे नहीं होते या उनके चेहरे और कपड़ों का रंग ही मटमैला होता है इसीप्रकार का १५-१८ लगभग वर्ष का नवयुवक भी था बेचारा वो निकल ही रहा था कि लडकी के धक्का लग गया आह फिर क्या था आधुनिक परिधानों वाली लडकी शायद कडक चाय पी के आई थी बड़ी जोर से आवाज में दिखता नहीं है स्वारी बोलने से क्या होता लाल पीली आंखों के साथ धक्का मारते हो वो बेचारा निकल ही गया जबकि वास्तव में खचाखच भरी भीड में धक्का उससे गलती से ही लगा था वो भी मामूली धक्का कहीं चोट नहीं आयी उसे जबकि मेट्रो में महिलाओं के लिये आरक्षित कोच भी है। खैर अब भीड ज्यादा दी इत्तेफाक से मैडम मेरे बगल में ही खड़ी थी वो अपने व्हाट्सअप में व्यस्त थी अचानक से ब्रेक लगता अब उन्हें सामने पकडने की जरूरत पड़ी बिना देखे ही हांथ आगे कर दिया अब उनका हाथ मेरे मुख पर बैठ गया फिर क्या मैडम ने बड़ी ही सुरीली आवाज में बोला स्वारी लगी तो नहीं " मैंने चुपचाप ना में सर हिला दिया और शांत हो गया। अब नंबर बैग वाले भईया का था गलती थी उनकी वो बैग टांगे हुए थे जबकि इंस्ट्रेक्सन आते है बैग मत टांगे" का उन्होंने उसको भी डांटा लेकिन उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया अब मुझसे फिर सुरीली आवाज में बोलने लगी इंस्ट्रक्शन ही नहीं सुनाई देते लोगों को और भी कुछ बोल रही थी भूल गया मैं फिर जाते जाते पूछने लगीं वैशाली के लिये ट्रेन यही से मिलेगी फिर क्या मैं भी नया था परंतु बुद्धि का प्रयोग किया और रूट मैप देख लिया और उन्हें बता दिया और वो बिना धन्यवाद बोले उतर गईं। तभी मैं एहसास करने लगा कि अपनी गलती गलती होती है और दूसरे की गलती अपराध होती है वो किसी भी स्तर पर हो सबका विचार लगभग एक ही रहता है कुछ रिश्ते तो एक गलती में ही टूट जाते हैं जबकि अगर हम गलती को गलती ही समझें तो रिश्ते प्यारे और सच्चे होते हैं उनकी मंजिल मिले ना मिले पर रिश्तों में प्रेम विश्वास साहस ऊर्जा बहुत होगी। सादर