सोमवार, 15 दिसंबर 2014

एक इंसान के कितनी मां हो सकती है न

कृपया लाईक कमेंट नहीं भी करेंगें तो चलेगा क्यूंकि आज मैं बेवजह ही हंस रहा हूं क्यूंकि मेरा हंसने का मन है क्यूंकि मैने फेसबुक में आज सुबह से ही ऐसा कुछ पढा है कि जो गंभीर मुद्दे पर लिखने वाला था वह भी लिखने से पीछे हंट रहा हूं।

और लाईक और कमेंट ना करने का अनुरोध इसलिये कर रहा हूं कि यह बात भी बेवजह ही लिख रहा हूं बेवजह लिखे हुये पर लाईक कमेंट क्यूं करें आप लोग इस लिखने का कोई अर्थ नहीं हां मेरी मां जरूर इस लिखे पर भी अर्थ निकाल लेगी या निकाल लेती भले मैं कितना बडा हो जाऊं पर मां के लिये छोटा हूं मैं मूर्ख रहूं पर मां के लिये प्यारा रहूंगा क्यूंकि मुझे मेरी मां ने नौ महीने गर्भ में पाला फिर मुझे चलना सिखाया जीवन जीने के लिये संस्कार दिये।

मेरी गलती पर मुझे पीटा भी मेरे होमवर्क में मेरी सहायता भी मां ही तो एक भावनात्मक शब्द है जिससे सारी दुनिया जीती जा सकती है जैस भारत माता के भावनात्मक नाम पर बडे बडे चुनाव जीते जाते हैं हम इस धरती को मां कहते हैं इस धरती से बडी मां क्या और कौन हो सकता है बचपन से लेकर आज तक धरती मां के पल्लू में तो चिपटा रहा मैं , खेल खेल में जब मैं गिर जाता था तब मां के पल्लू की धूल मेरी कोमल देह में लग जाती थी और जब चोंट लगती थी तो मेरी जन्मदात्री मां मेरे मलहम पट्टी कर देती थी।

जो इंसान बचपन से ही भारत माता की पल्लू में लिपटा रहा आखिर उसे अपनी मां को पवित्र बनाने के लिये कुछ मौलिक लिखना चाहिये अवश्य लिखना चाहिये आखिर जन्म देने वाली मां और हर वो औरत जो मां के योग्य हो या जिसने अपना बेटा मान लिया उसके सिवाय हमारे जन्म के समय से अदृश्य रुप से अगर किसी ने हमें संभाला हमारे पैरों का भार हमारे लंबे चौडे कद का भार अगर किसी ने संभाला तो वह हमारी मां धरती मां है इस मां का हम पर कर्ज है इस मां के प्रति हमारा कर्तव्य है इसकी पवित्रता बनाये रखना हमारा कर्तव्य है।

मां का रूप कभी पिता आकाश धारण नहीं कर पाया आकाश सदैव आकाश ही रहा है धरती और आकाश में कितना फर्क कितने प्रकाश वर्ष की दूरी है यह विज्ञान भी कहता है हम और आप भी समझते हैं आखिर आकाश पुरूष है धरती औरत है , पुरूष और औरत के हृदय में ईश्वर ने भी फर्क किया है मां की ममता को मां के हथेली के एहसास को एक पिता एक पुरूष से शायद ही एहसास किया जाता हो इसीलिये प्रत्येक बेटे का जो मां से आत्मिक लगाव होता है वह एक पुरूष एक पिता से संरक्षण प्रेम मात्र होता है।

एक पुरूष और एक औरत के प्रेमत्व और ममत्व में जमीन आसमान का फर्क है आकाश , आकाश पिता है और धरती मां मां है अन्नदात्री है आकाश पूरक तो हो सकता है परंतु मां की तरह हमें पल्लू में लिपटा नहीं सकता आकाश में पहुचते भी हैं तो बडे लोग वो भी प्लेन से अपने पैसे की हैसियत से अपनी पहुंच से अपने फायदे के लिये आकाश को मां कह दें और हम मान लें तो क्यूं मान लें मां बनने हक उसी को है जो संसार के हर एक बेटे को अपने आप में समाहित कर ले जो अपने ममत्व से सब में प्यार भर दे जो बेटे का दर्द सह के भी मुस्कुराये वही तो मां है बाकी आधुनिकता के समय में मां शब्द से खेलने वालों की कमीं नहीं है असली मां धरती मां है समा जाओ मां के पल्लू में समा जाओ इस धरती मां की हथेलियों में और शांति का एहसास करो और लिखो कुछ मौलिक करो कुछ मौलिक कि यह धरती मां रक्तरंजित ना होने पाये बिखेर दो अपनी भावनाओं को सजा दो अपने आदर्शवाद की दुकान कुछ तो करो इस सच्ची पवित्र मां के लिये।।।।।।।।

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