बुधवार, 7 जनवरी 2015

साईं मंदिर में मेरा पहला अनुभव

आज मैं वह बात लिख रहा हूं जो मैने 31दिसंबर की रात से अबतक नहीं लिखा था और उस रात को कुछ फोटो अपलोड की थी लेकिन यह लिखने की हिम्मत नही थी इसलिये नहीं कि मैं भयभीत था इसलिये की मैं किसी के सवालों का जवाब समयानुकूल नहीं दे सकता था।

मेरी सोच समझ यही कहती है कि हमें सबकुछ अपनी आंखों से देखना चाहिये और अपने दिमाग से विचार करना चाहिये और हृदय से एहसास करना चाहिये कि क्या सही है और क्या गलत है।

मुझे पहले भी बहुत बार अवसर मिले थे कि शिरडी चलो लेकिन व्यस्तता के चलते मैं उन अवसरों को भुना नहीं सका क्यूंकि काम भी आवश्यक रहता था मैने भी साईं बाबा का नाम बहुत सुना था और जिज्ञासा थी दर्शन करने की और इस वर्ष मुझे यह अवसर तब मिला जब एक बडी धर्म संसद लग चुकी है।

नि:संदेह साधु संत महान है मुझे उनकी योग्यता पर शक नहीं उनके कहे हुये पर शक नहीं लेकिन सच को हम अपने हृदय से ही एहसास कर सकते है मैं वेदों का ज्ञाता नहीं लेकिन अपने सीने में धडकती हुयी धडकनों का एहसासों का ज्ञाता हूं मेरी धडकने क्या कहती है यह मुझसे ज्यादा कोई और जान ही नहीं सकता भले डा. आला लगा ले सिर्फ वह धडकन की गति का एहसास कर सकता है लेकिन वह कहती क्या है सिर्फ मैं ही एहसास कर सकता हूं।

मैं वह लडका हूं जो लाइन में लगने से आजतक डरता रहा अपने जीवनकाल में अबतक मैं जल्दी लाइन में नहीं लगा या तो सबसे शुरूआत में काम कराया या फिर सबसे अंत में लेकिन लाइन में लगने से बहुत दिमागी चिंता होती है मुझे।

मैं अपने जीवन में एक्तीस दिसंबर की रात 2:00 बजे पहली बार लाइन में लगा वह भी जबरदस्त भीड में उस भीड को देखकर हमारे दो मित्र हाटेल वापस हो लिये लेकिन हम तीन एक साथ डटे रहे मैं नाम नहीं लूंगा उनका क्यूंकि यहां सिर्फ मैं ही जवाबदेह हूं और मेरी ही व्यथा है।

जीवन में पहली बार मैं 7:00 घंटे लाइन में रहा कभी कभी बैठ भी जाता था पैर बहुत तक चुके थे शारीरिक थकान बढती जा रही थी दिल दिमाग सब परेशान हो रहे थे लेकिन मेरे मन में था कि मुझे दर्शन तो करने ही ह जिसके लिये हंगामा हुआ वहां भीड देखते बनती थी इससे यह स्पष्ट हो रहा था कि बहुत से श्रद्धालु है जो सिर्फ अपने दिल और दिमाग से चलते है और होना भी चाहिये।

मेरे लिये यह चुनौती इसलिये है कि मैं सभी की नजरों में कुछ और ही हूं लेकिन मैं अपनी नजरों में क्या हूं यह मुझे ही पता है। लगभग सात घंटे के बाद मैं बाबा के सामने था और बाबा मेरे सामने थे मैने बाबा के आंखों से आंखें मिलायी दिल से प्रणाम किया वो इसलिये कि मुझे नहीं पता सच्चाई क्या है बस एक सच्चाई यह है जिसे मैने एहसास किया जिस सौरभ के पैर थक चुके थे जो सौरभ शारीरिक दर्द से व्यथित था वह सौरभ इतना स्वस्थ कैसे हुआ वह ऊर्जा कहां से आयी कि मैं तनकर खडा होने लायक हो गया मेरे मायूस चेहरे में प्रसन्नता कैसे छा गयी ऐसा क्या हुआ था मैं तो सिर्फ देखने गया था कि बाबा कैसे है और मंदिर के अंदर क्या है क्या वास्तव में बाबा वरदान देते है लेकिन मैं कोई वरदान मांगने नहीं गया था।

अपने जीवन का मालिक हूं किसी भी राजनीति कूटनीति से ज्यादा यथार्थ पर जीने की कोशिश करता हूं मैं राजनीति करना चाहता हूं पर अपने आपको धोखे पर रखकर नहीं और जब खुद को धोखा नहीं दूंगा तो कभी किसी को धोखा दूंगा नहीं।

इसलिये मैने खुद को धोखा नहीं दिया मैं बाबा के पास गया नजदीक से देखा मन के स्पर्श से छू लिया बाबा को और बाबा ने मेरी थकान दूर कर दी बस फिर क्या था मैं हमेशा की तरह स्वयं के कल्याण के साथ अपने राष्ट्र अपने समाज के भाई बहन मां मित्र सभी के लिये प्रार्थना की कि इस नववर्ष में सभी को अपार खुशियां देना सभी के काम सफल हों सबके दुखों को हर लेना हमारे राष्ट्र और समाज का कल्याण हो।

*ऊँ साईं राम*

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