धार्मिक और सामाजिक विवाह और कत्ल। ये दांस्ता है कानपुर महानगर के एक कारोबारी परिवार की जहां धन की कमी नहीं थी परंतु विवेक और आपसी समझ की कमी जरूर रही होगी। माता पिता बच्चों को जन्म देते हैं और उनकी परवरिश करते हैं और एक उम्र तक आते आते वो अपने बच्चे को बड़ा व समझदार समझने लगते हैं और जिस प्रकार से बुढ़ापे में आंखों की रोशनी कमजोर होने लगती वैसे ही बच्चों की बढती उम्र से माता पिता उन्हें समझदार मानकर अपनी नजरें हटा लेते हैं जबकि इसी बढती उम्र के साथ ही बच्चों को माता पिता के सहयोग व भावनात्मक मार्गदर्शन की सदैव आवश्यकता रहती है वरन् नवयुवकों को भटकते देर नहीं लगती यह तरूणावस्था की उम्र बचपन की अपेक्षा ज्यादा खतरनाक हो सकती है और इसके बहुत से उदाहरण मिल जायेगें जब इस उम्र में बहुत से नवयुवक अपने जीवन का रास्ता भटक गये। हमारी भारतीय संस्कृति मे विवाह जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक वा धार्मिक बंधन है सभी धर्मों की अलग अलग परंपरायें हैं उनमें से एक धर्म हिंदू धर्म है हम विभिन्न धार्मिक परंपराओं के साथ साथ अग्नि के सात फेरे सात जन्मों हेतु लेते हैं और ढेरों वैदिक धार्मिक मंत्रोच्चार के साथ अग्नि के सात फेरे पूरे होते ही हमारे विवाह को सामाजिक मान्यता मिल जाती है लेकिन तथ्यात्मक व रहस्यात्मक बात यह है कि इन सात फेरों के साथ सात जन्मों के लिये सातो(७+७=१४) दिल मिले या नहीं? हमारे विचार मिले या नहीं हम भावनात्मक रूप से जुड पाये या नहीं इस पर कभी कोई विचार नहीं होता। शादी जीवन में परिवर्तन लाती है वैवाहिक जीवन में प्रवेश कराने से पहले क्या माता पिता परिवार रिश्तेदारों को आवश्यकता नहीं कि जिसकी हम शादी करने जा रहे हैं वो दिमागी रूप से हृदय से क्या तैयार है जिससे हम इसे जोडने जा रहे हैं क्या इन दोनों के विचार मिलते हैं क्या ये दोनों एक दूसरे को स्वरूपात्मक व भावनात्मक रूप से पसंद करते हैं या नहीं क्या ये दोनों मरते दम तक साथ रह सकते हैं? हमारे समाज में ऐसी मान्यता नहीं है हालांकि काफी परिवर्तन आया है परंतु उस परिवर्तन में भी अभी कमी है। हमारे समाज में नवयुवक एक तय उम्र तक पहुंचा नहीं कि उसके माता पिता उसे धंधे रोजगार में लगाने से पहले ही उसके परिपक्व होने से पहले ही उसे वैवाहिक बंधन में बांधने को तैयार हो जाते हैं और उस विवाह को पारिवारिक वा सामाजिक इज्जत से जोडते हैं "#दिल_मिले_ना_मिले_जाति_धर्म_मिलना_आवश्यक_है। बांकी काम पंडित जी पूरा कर देते हैं पत्रा में देख के गुण मिला देते हैं और आजतक पंडित जी के द्वारा मिलाये हुए गुणों की शादी जी बहुत कम जाती है बल्कि काटी ज्यादा जाती है और ऐसा नहीं है कि प्रेम विवाह में समस्यायें नहीं आती वहां भी समस्यायें आ सकती है और आती है पर अपनी पसंद से शादी करने का संतोष रहता होगा और संतोष रहना चाहिए और उस प्रेम विवाह में कभी तो हम प्रेम में जीते ही हैं भले कुल पल जियें पर प्रेमरूपी संतोष हो जाता है परंतु घर परिवार की पसंद से की गई शादी में शायद ही पल भर के प्रेम में हम जी पाते हो। दो शरीरों का मिलन दो आत्माओं का मिलन यूं ही नहीं होता हमें पूरे वैवाहिक परंपराओं पर विचार करने की आवश्यकता है कम से कम एक नहीं सौ बार लडका लडकी से पूंछने की आवश्यकता है कि तुम ये वैवाहिक जीवन जीने को तैयार हो या नहीं? जबतक प्रत्युत्तर में कडाकेदार "हां" न मिल जाये तब शादी को इज्जत के नाम पर जोडकर तैयार नहीं होना चाहिए नहीं तो उसके परिणाम उल्टे हो सकते हैं आपका बेटा बेटी अवसादग्रस्त हो सकते हैं वो अपने मार्ग को भटक सकते हैं। पीयूष जन्म से अपराधी नहीं था पीयूष विवाह के पूर्व भी अपराधी नहीं था परंतु पीयूष विवाह के उपरांत अपराधी हो गया वो भी किसी और का नहीं अपनी सात फेरों वाली सात जन्मों की जीवन संगिनी का अपराधी हो गया और सात जन्मों की बात छोडिए इसी जन्म में विछड गये उसकी जीवन संगिनी इस संसार से मुक्त हो गयी और जीवनसाथी कारागृह में सलाखों के पीछे पहुंच गया। पीयूष ऐयास था ये कहूं या पीयूष ऐयास हो गया ये कहूं उसकी जीवनसंगिनी भी बला की खूबसूरत थी मुझे तो शालीन भी दिख रही थी उसकी आंखों में ईमानदारी साफ झलक रही थी फिर भी पीयूष ने उस मासूम का कत्ल कर दिया पता नहीं क्यूं आखिर क्यूं? शायद पीयूष अभी तक परिपक्व नहीं था बड़े रहीश खानदान का था तो ऐयाशी के ऐसे मार्ग पर भटका कि अपनी पत्नी का कत्ल करा दिया ये किसी और के प्रति प्यार है या हवस है लेकिन इस समस्या का हल मौत नहीं थी परंतु ये विवाह अंत में मौत और मातम का रूप धारण कर लेगा किसी ने सोचा नहीं रहा होगा कि हम अपने बेटे की शादी नहीं सलाखों के पीछे भेजने का काम कर रहे हैं और हम अपनी बेटी की शादी नहीं मौत दे रहे हैं ये दोनों एक दूसरे के जीवनसाथी नहीं अपराधी हैं कोई कल्पना नहीं कर सकता और ऐसी बहुत सी शादियां टूटती हैं या शादियां जी नहीं जाती बल्कि इंसान जीवन काटता है समाज को पुनर्विचार करने की आवश्यकता है अगर आपको अपने बेटे को पीयूष और बेटी को ज्योति नहीं बनाना ??????????????????????
गुरुवार, 31 जुलाई 2014
धार्मिक और सामाजिक विवाह और कत्ल। ये दांस्ता है कानपुर महानगर के एक कारोबारी परिवार की जहां धन की कमी नहीं थी परंतु विवेक और आपसी समझ की कमी जरूर रही होगी। माता पिता बच्चों को जन्म देते हैं और उनकी परवरिश करते हैं और एक उम्र तक आते आते वो अपने बच्चे को बड़ा व समझदार समझने लगते हैं और जिस प्रकार से बुढ़ापे में आंखों की रोशनी कमजोर होने लगती वैसे ही बच्चों की बढती उम्र से माता पिता उन्हें समझदार मानकर अपनी नजरें हटा लेते हैं जबकि इसी बढती उम्र के साथ ही बच्चों को माता पिता के सहयोग व भावनात्मक मार्गदर्शन की सदैव आवश्यकता रहती है वरन् नवयुवकों को भटकते देर नहीं लगती यह तरूणावस्था की उम्र बचपन की अपेक्षा ज्यादा खतरनाक हो सकती है और इसके बहुत से उदाहरण मिल जायेगें जब इस उम्र में बहुत से नवयुवक अपने जीवन का रास्ता भटक गये। हमारी भारतीय संस्कृति मे विवाह जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक वा धार्मिक बंधन है सभी धर्मों की अलग अलग परंपरायें हैं उनमें से एक धर्म हिंदू धर्म है हम विभिन्न धार्मिक परंपराओं के साथ साथ अग्नि के सात फेरे सात जन्मों हेतु लेते हैं और ढेरों वैदिक धार्मिक मंत्रोच्चार के साथ अग्नि के सात फेरे पूरे होते ही हमारे विवाह को सामाजिक मान्यता मिल जाती है लेकिन तथ्यात्मक व रहस्यात्मक बात यह है कि इन सात फेरों के साथ सात जन्मों के लिये सातो(७+७=१४) दिल मिले या नहीं? हमारे विचार मिले या नहीं हम भावनात्मक रूप से जुड पाये या नहीं इस पर कभी कोई विचार नहीं होता। शादी जीवन में परिवर्तन लाती है वैवाहिक जीवन में प्रवेश कराने से पहले क्या माता पिता परिवार रिश्तेदारों को आवश्यकता नहीं कि जिसकी हम शादी करने जा रहे हैं वो दिमागी रूप से हृदय से क्या तैयार है जिससे हम इसे जोडने जा रहे हैं क्या इन दोनों के विचार मिलते हैं क्या ये दोनों एक दूसरे को स्वरूपात्मक व भावनात्मक रूप से पसंद करते हैं या नहीं क्या ये दोनों मरते दम तक साथ रह सकते हैं? हमारे समाज में ऐसी मान्यता नहीं है हालांकि काफी परिवर्तन आया है परंतु उस परिवर्तन में भी अभी कमी है। हमारे समाज में नवयुवक एक तय उम्र तक पहुंचा नहीं कि उसके माता पिता उसे धंधे रोजगार में लगाने से पहले ही उसके परिपक्व होने से पहले ही उसे वैवाहिक बंधन में बांधने को तैयार हो जाते हैं और उस विवाह को पारिवारिक वा सामाजिक इज्जत से जोडते हैं "#दिल_मिले_ना_मिले_जाति_धर्म_मिलना_आवश्यक_है। बांकी काम पंडित जी पूरा कर देते हैं पत्रा में देख के गुण मिला देते हैं और आजतक पंडित जी के द्वारा मिलाये हुए गुणों की शादी जी बहुत कम जाती है बल्कि काटी ज्यादा जाती है और ऐसा नहीं है कि प्रेम विवाह में समस्यायें नहीं आती वहां भी समस्यायें आ सकती है और आती है पर अपनी पसंद से शादी करने का संतोष रहता होगा और संतोष रहना चाहिए और उस प्रेम विवाह में कभी तो हम प्रेम में जीते ही हैं भले कुल पल जियें पर प्रेमरूपी संतोष हो जाता है परंतु घर परिवार की पसंद से की गई शादी में शायद ही पल भर के प्रेम में हम जी पाते हो। दो शरीरों का मिलन दो आत्माओं का मिलन यूं ही नहीं होता हमें पूरे वैवाहिक परंपराओं पर विचार करने की आवश्यकता है कम से कम एक नहीं सौ बार लडका लडकी से पूंछने की आवश्यकता है कि तुम ये वैवाहिक जीवन जीने को तैयार हो या नहीं? जबतक प्रत्युत्तर में कडाकेदार "हां" न मिल जाये तब शादी को इज्जत के नाम पर जोडकर तैयार नहीं होना चाहिए नहीं तो उसके परिणाम उल्टे हो सकते हैं आपका बेटा बेटी अवसादग्रस्त हो सकते हैं वो अपने मार्ग को भटक सकते हैं। पीयूष जन्म से अपराधी नहीं था पीयूष विवाह के पूर्व भी अपराधी नहीं था परंतु पीयूष विवाह के उपरांत अपराधी हो गया वो भी किसी और का नहीं अपनी सात फेरों वाली सात जन्मों की जीवन संगिनी का अपराधी हो गया और सात जन्मों की बात छोडिए इसी जन्म में विछड गये उसकी जीवन संगिनी इस संसार से मुक्त हो गयी और जीवनसाथी कारागृह में सलाखों के पीछे पहुंच गया। पीयूष ऐयास था ये कहूं या पीयूष ऐयास हो गया ये कहूं उसकी जीवनसंगिनी भी बला की खूबसूरत थी मुझे तो शालीन भी दिख रही थी उसकी आंखों में ईमानदारी साफ झलक रही थी फिर भी पीयूष ने उस मासूम का कत्ल कर दिया पता नहीं क्यूं आखिर क्यूं? शायद पीयूष अभी तक परिपक्व नहीं था बड़े रहीश खानदान का था तो ऐयाशी के ऐसे मार्ग पर भटका कि अपनी पत्नी का कत्ल करा दिया ये किसी और के प्रति प्यार है या हवस है लेकिन इस समस्या का हल मौत नहीं थी परंतु ये विवाह अंत में मौत और मातम का रूप धारण कर लेगा किसी ने सोचा नहीं रहा होगा कि हम अपने बेटे की शादी नहीं सलाखों के पीछे भेजने का काम कर रहे हैं और हम अपनी बेटी की शादी नहीं मौत दे रहे हैं ये दोनों एक दूसरे के जीवनसाथी नहीं अपराधी हैं कोई कल्पना नहीं कर सकता और ऐसी बहुत सी शादियां टूटती हैं या शादियां जी नहीं जाती बल्कि इंसान जीवन काटता है समाज को पुनर्विचार करने की आवश्यकता है अगर आपको अपने बेटे को पीयूष और बेटी को ज्योति नहीं बनाना ??????????????????????
मेरी मातृभाषा
मैं हिंदुस्तानी हू मेरी मां हिंदुस्तानी है मेरा जन्म हिंदुस्तानी मां की गर्भ से हुआ है मेरी जुबान पर आने वाली पहली भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम मेरी मातृभाषा हिंदी है और मैं अंग्रेजी में होने वाले हर एक कार्य का विरोध करता हूं अंग्रेजी वो भाषा है जो हमारे लिये धोखा है धोखे से बढकर कुछ नहीं। मेरी मां ने मुझे हिंदी सिखायी है तो मैं हिंदी ही बोलूंगा हिंदी ही लिखूंगा और यही मेरा अभिव्यक्ति का माध्यम है मैं उस अंग्रेजी मानसिकता की गुलाम सरकार व कार्यों का विरोध करता हूं ये हमारे साथ धोखा है एक मीठा जहर जिसे मैं पीने से इंकार करता हूं मुझे गर्व है कि मैं हिंदी भाषी हूं और इस क्रांति में सहभागी हूं मैं अपने भाईयों के साथ हूं जिनकी जान गई है उन्हें शहीद का दर्जा मिले सरकार को जल्द से जल्द विचार करना चाहिए ये हमारी मातृभाषा और हमारी भारतीयता का अपमान है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
#क्रांति
कहना तो बहुत कुछ.................पर
अपनी गलती, गलती होती है और दूसरे की गलती अपराध होती है। ये विचार मेरे मन में इसलिये जन्म लिये कि जब मैं मेट्रो में यात्रा कर रहा था तभी खचाखच भरे कोच में एक आधुनिक परिधान पहने हुए २१वीं सदी की लडकी भी यात्रा करने के लिये प्रवेश करती है। अब चूंकी ये ट्रेन है तो अमीर गरीब सभी यात्रा करते हैं साफ सुथरे कपड़े वाले भी और जिनके पास कपड़े साफ करने के लिये पैसे नहीं होते या उनके चेहरे और कपड़ों का रंग ही मटमैला होता है इसीप्रकार का १५-१८ लगभग वर्ष का नवयुवक भी था बेचारा वो निकल ही रहा था कि लडकी के धक्का लग गया आह फिर क्या था आधुनिक परिधानों वाली लडकी शायद कडक चाय पी के आई थी बड़ी जोर से आवाज में दिखता नहीं है स्वारी बोलने से क्या होता लाल पीली आंखों के साथ धक्का मारते हो वो बेचारा निकल ही गया जबकि वास्तव में खचाखच भरी भीड में धक्का उससे गलती से ही लगा था वो भी मामूली धक्का कहीं चोट नहीं आयी उसे जबकि मेट्रो में महिलाओं के लिये आरक्षित कोच भी है। खैर अब भीड ज्यादा दी इत्तेफाक से मैडम मेरे बगल में ही खड़ी थी वो अपने व्हाट्सअप में व्यस्त थी अचानक से ब्रेक लगता अब उन्हें सामने पकडने की जरूरत पड़ी बिना देखे ही हांथ आगे कर दिया अब उनका हाथ मेरे मुख पर बैठ गया फिर क्या मैडम ने बड़ी ही सुरीली आवाज में बोला स्वारी लगी तो नहीं " मैंने चुपचाप ना में सर हिला दिया और शांत हो गया। अब नंबर बैग वाले भईया का था गलती थी उनकी वो बैग टांगे हुए थे जबकि इंस्ट्रेक्सन आते है बैग मत टांगे" का उन्होंने उसको भी डांटा लेकिन उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया अब मुझसे फिर सुरीली आवाज में बोलने लगी इंस्ट्रक्शन ही नहीं सुनाई देते लोगों को और भी कुछ बोल रही थी भूल गया मैं फिर जाते जाते पूछने लगीं वैशाली के लिये ट्रेन यही से मिलेगी फिर क्या मैं भी नया था परंतु बुद्धि का प्रयोग किया और रूट मैप देख लिया और उन्हें बता दिया और वो बिना धन्यवाद बोले उतर गईं। तभी मैं एहसास करने लगा कि अपनी गलती गलती होती है और दूसरे की गलती अपराध होती है वो किसी भी स्तर पर हो सबका विचार लगभग एक ही रहता है कुछ रिश्ते तो एक गलती में ही टूट जाते हैं जबकि अगर हम गलती को गलती ही समझें तो रिश्ते प्यारे और सच्चे होते हैं उनकी मंजिल मिले ना मिले पर रिश्तों में प्रेम विश्वास साहस ऊर्जा बहुत होगी। सादर
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