मित्रों पिछले कुछ दिनों से ही अक्सर मेरा मन उदास हो जाता है। मुझे कुछ बचपन की बातें घटनाएं याद आ गई आज मैं ये सब इसलिए नहीं लिखने जा रहा हूं कि मैं आपको अपनी उन बातों को सिर्फ बताना चाहता हूं नहीं बिलकुल नहीं बल्कि उन एहसासों से सबको सीख मिले चाहे वो गुरू जी हों या शिशु विद्या मंदिर का विद्यार्थी। मित्रों बात उन दिनों की है जब मैं बचपन में अपने ही कस्बे के विद्या मंदिर का विद्यार्थी हुआ करता था। वीणावादिनी मां सरस्वती के आशीर्वाद मैं भी पढने में अव्वल था और ऐसी ही कुछ मां की कृपा मेरी ही सहपाठनी को प्राप्त थी। हम दोनों की प्रतिस्पर्धा रहती थी कौन कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करेगा और अक्सर हम दोनों ४-१० नंबर के अंतर से प्रथम द्वितीय आते रहते थे। एक बार गणित के पेपर में एक सवाल छूट गया था तब वो त्रैमासिक परीक्षा थी मैं बहुत रो रहा था क्यूंकि मुझे दुख हो रहा था कि मैं अब पीछे हो जाऊंगा। उसकी छोटी बहन भी उसी स्कूल में पढती थी जासूस नं.१ और उसनें अपनी जासूसी के तहत मुझे रोते हुए देख लिया और एक कदम भी ना रूककर किंगफिशर एयरलाइन्स की तेज रफ्तार से वह अपनी बड़ी बहन यानी कि मेरी प्रतिस्पर्धी सहपाठिनी को बता ही दिया दीदी दीदी सौरभ कक्षा में बैठ के अकेले में रो रहा है तभी मेरी सहपाठिनी का उसी कक्षा में प्रवेश होता है और वो बोलती हैं क्यूं रो रहे हो मत रोओ मेरा भी अंग्रेज़ी का पेपर बिगड गया है २ प्रश्न छूट गये हैं तुम चिंता मत करो तुम इस बार आगे रहोगे। ऐसे बोली जैसे मेरे बिन बोले मेरे मन की बात पढ ली थी लेकिन साथ ही मेरी सहपाठिनी का घमंड भी बोल गया था उसने कहा लेकिन तुम्हें चुनौती देती हूं अर्द्धवार्षिक परीक्षा में अगर तुम आगे हो गये तो मैं स्कूल छोड दूंगी। मैं एकदम चुप आखिर मैं क्यूं चाहूंगा वो स्कूल छोड थे एक वो भी तो थी जिसकी वजह से पढना भी रूचिकर था। मैंने वो चुनौती स्वीकार कर ली मन ही मन सोचता था इसे स्कूल नहीं छोडने दूंगा और एक दिन उसकी अनुपस्थिति में एक अध्यापक थे उनसे बातें होने लगी इसी संबंध में तो उन्होंने कहा सौरभ मेहनत कितनी भी करनी पड जाये तुम्हें इस लडकी का घमंड तोडना है मैंने भी सोचा जंग में कभी भावनाओं में नहीं बहा करते और अपनी सर्वोत्कृष्ट तैयारी शुरू कर दी। अर्द्धवार्षिक परीक्षा हुई और एकदिन अंतिम परिणाम घोषित हो गया और ईश्वरीय कृपा से मैं कक्षा में ही नहीं स्कूल टाप कर दिया उस वक्त पूरे स्कूल में सबसे ज्यादा मेरे नंबर आये। लेकिन मैंने अपनी सहपाठिनी को स्कूल नहीं छोडने दिया और वो भी स्कूल छोड के नहीं जा सकती थी एक नहीं सौ बार हार जाये इस प्रकार से हम अच्छे पडोसी और अच्छे दोस्त भी थे और अच्छे सहपाठी। अब ये इत्तेफाक ही था कि बचपन से ही चुनाव लडने का भूत सवार था स्कूल में ही कक्षा पांच से ३ बार सेनापति रहा एक बार निर्विरोध और एक बार मेरा ही हमदर्द मेरे सामने था लेकिन फिर भी पूरे स्कूल की बहुतायत छात्र छात्राओं ने मुझे ही पसंद किया था और भारी अंतर से चुनाव जीता भी था बस एक बार कक्षा ८ में एक चुनाव हारा था जबकि मुझे मेरे शुभचिंतक गुरूजी ने सुझाव दिया था कि तुम अध्यक्ष का चुनाव लडो तो मैंने बोल दिया मेरी वर्दी रखी है वो बेकार हो जायेगी और उस समय मैं कुछ मतों के अंतराल से अपने ही दोस्तों कि जलन से वो चुनाव हार गया पहली बार हार का सामना किया था वो कोई और नहीं Pawan Tiwari जी हैं जो मुझसे एक कक्षा पीछे थे लेकिन फिर भी सीनियर स्टूडेंट होने की वजह से मुझे सम्मान मिला प्रार्थना सभा स्थल पर पहले की तरह मैं ही नेतृत्व करता रहा और मेरी सहपाठिनी और इसी कारण हम प्रार्थना खत्म होते ही जल्द ही कक्षा में पहुंच जाते थे और हमारी बातें शुरू हो जाती थी और हमारे अध्यापक को गलतफहमी हुई वो मुझसे बोलने लगे तुम ईधर से नहीं ईधर से जाओगे सबके साथ मैं बचपन से ही कुछ ऐसा ही था मैंने उनसे पूंछ ही लिया इधर से जाने में और उधर से जाने में क्या अंतर है? उन्होंने जवाब दिया वो तुम जानते हो और मैं जानता हूं तो मैंने भी कह दिया जो आप जानते हो और मैं जानता हूं वो सभी जान जायें और वो अपने कार्यालय मैं अपनी कक्षा में मुझे मारने आ रहे थे परंतु अध्यापकों ने रोक दिया। जब कर नहीं तो डर किस बात का। कुछ समय पश्चात नया वर्ष था वो समय मैसेज फेसबुक इंटरनेट मोबाइल का था ही नहीं लैंडलाइन हम दोनों के घर में जरूर था और ग्रीटिंग्स का जमाना था। उसी समय हमारी लडाई भी हुई थी तब मेरा अनुमान और लैंडलाइन का कमाल काम आया था मैंने नंबर डायल किया घंटी बजी और मेरे अनुमान के अनुसार मेरी सहपाठिनी ने ही फोन उठा लिया शिवाय उसका नाम लेने के मैं कुछ बोल ना सका और रिसीवर वापस पटक दिया और फोन कट गया अगली सुबह हम दोस्त हो गये फिर से। अब नया वर्ष नजदीक था मैं ढेर सारे ग्रीटिंग्स लाया था उनमें से एक ग्रीटिंग बहुत ही खूबसूरत थी तभी मेरी बहन ने बोला लाओ ये ग्रीटिंग मुझे दे दो मैं दे देती हूं यानी कि मेरी सहपाठिनी को मैं कब मना करने वाला था उसके बताये अनुसार अपनी लेखनी में उसके नाम से ग्रीटिंग लिख दिया मैने। मुझे एहसास भी नहीं था आगे क्या होगा। मेरी बहन के द्वारा ग्रीटिंग मेरी सहपाठिनी के हांथ में पहुंच गया और उसने स्कूल से लौटते हुए रास्ते में ही ग्रीटिंग को लिफाफे से आजाद कर दिया लिफाफा फाड के। जैसे ही उसने ग्रीटिंग देखा तो मेरी लेखनी पहचान गई और उसने अपनी सहेली से सहज भाव से ही कह दिया कि ये सौरभ का लिखा हुआ है और इत्तेफाक से मेरे एक अध्यापक की पारिवारिक मेरी ही छोटी बहन उसके पीछे थी उसके कानों में सच सुनाई दिया था कि ग्रीटिंग सौरभ का लिखा हुआ है और उसने अपने चाचा जी को बोल ही दिया जो कि अध्यापक थे कि सौरभ ने ग्रीटिंग दिया है हाय तौब मच गई मेरी सहपाठिनी ईधर ऊधर फर्राटे मारते हुए बिन चेतक के तेज रफ्तार में ईधर उधर दौड रही थी गुस्से से लालपीली मैं आराम से बैठा था देख तमाशा लकड़ी का" मैं भी सोच रहा था क्या बात है और तभी मुझे मेरे अध्यापक का बुलावा फील्ड के लिये आ ही गया मैं निडर था और पहुंच गया उन्होंने बोला तुमने ग्रीटिंग दिया है मैे बोला मैंने नही दिया इस प्रकार से फील्ड के चक्कर पूरे होने को आ गये उनकी हां और मेरी ना में तभी गिरी हुई चाल का गिरा हुआ मोहरा सामने आता है गवाह के रूप में कि एक बार मैं उससे बोल रहा था ग्रीटिंग देने के लिये। हा हा हा हा हा हा अब ऐसा क्यूं किया था पता नही पर मुझे बोले चलो कार्यालय में मुर्गा बन जाओ मैंने साफ बोला आज तक ठीक से दो छड़ी मार तो खाई नहीं अगर कभी मौका भी आया था तो हल्के हांथों से मार के रफा दफा कर देते थे तो मैं मुर्गा नहीं बन सकता और मेरी गलती भी नहीं है मैं कक्षा में गया अपना बैग उठाया और उन्हें साफ बोल दिया मेरा नाम काट दीजिए मैं घर जा रहा हूं और मैं सीधा घर आ गया था। शायद मेरे जैसे बहुत से विद्यार्थी होगें। ये है मेरे बचपन के कुछ पल।
#बस_इत्ती_सी_बात
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